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बदहाली के आंसू बहा रहा किसान

Muzaffar nagar

Updated Sun, 23 Dec 2012 05:30 AM IST
शामली। अन्नदाता की खुशहाली और तरक्की को लक्ष्य कर राजनीति करने वाले चौधरी चरणसिंह के किसान आज बदहाली के आंसू रो रहे हैं। बड़े चौधरी के दौर में मौजूद रहे बुजुर्गों ने उनकी यादें साझा करते हुए कहा कि यदि चौधरी साहब आज होते तो किसानों की यह दुर्दशा नहीं होती।
जिले के करीब सवा लाख किसानों में से आधे से अधिक आज विभिन्न सहकारी और गैर सरकारी बैंकों के कर्जदार हैं। यूपी सहकारी ग्राम विकास बैंकों की शामली और झिंझाना शाखाओं से ही चार हजार से अधिक किसानों पर 40 करोड़ रुपये का कर्ज है। कर्ज समय से नहीं चुकाने पर किसानों की आरसी जारी कर उनके बिजली कनेक्शन काट दिए जाते हैं, लेकिन जब बात किसानों के भुगतान की आती है तो हर नियम कायदे को बिसरा दिया जाता है। हालत यह कि पिछले पेराई सत्र के गन्ने का भुगतान किसानों को छह महीने बाद मिल सका। वर्तमान में भी चीनी मिलें चालू हुए डेढ़ महीना होने को है, लेकिन अभी तक भुगतान का कहीं कोई जिक्र तक नहीं है।
अब बात करें भूमि अधिग्रहण की तो किसानों की भूमि का मुआवजा सर्किल रेट पर दिए जाने की बात होती है और जब किसान जमीन खरीदता है, तो उसे बाजार भाव से कम कीमत बताकर बैनामे में कम कीमत के स्टांप लगाने की बाबत नोटिस दिए जाते हैं। देहात क्षेत्र को 10 घंटे बिजली आपूर्ति के दावे होते हैं, लेकिन बिजली मिलती है बमुश्किल तीन से चार घंटे। नहरों में पानी आता नहीं और आबपाशी नियमित रूप से जारी कर दी जाती है। इन समस्याओं की आवाज उठाने पर भी किसानों की कहीं कोई सुनवाई नहीं होती।
चौधरी चरणसिंह के दौर के बुजुर्ग त्रिलोक चंद और उदयपाल धीमान कहते हैं कि यदि बड़े चौधरी आज जीवित होते तो किसानों की यह दुर्दशा नहीं होती। बतीसा खाप के चौधरी सूरजमल कहते हैं कि बड़े चौधरी ने हमेशा किसानो के भले की सोची, लेकिन आज की सरकारें केवल अपना भला चाहती हैं। भाकियू जिलाध्यक्ष जावेद तोमर कहते हैं कि आज देश के किसान को फिर से बड़े चौधरी जैसी शख्सियत की जरूरत है।

और जब चौधरी साहब ने दिया इस्तीफा
बुजुर्ग त्रिलोक चंद और उदयपाल ने बताया कि वर्ष 1959 में नागपुर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भारत में सहकारिता खेती लागू करने का प्रस्ताव रखा था। कांग्रेस के सभी बडे़ पदाधिकारी इसमें समर्थन में थे, जबकि चौधरी साहब ने सहकारी खेती अनिवार्य नहीं बल्कि किसानों की मर्जी पर लागू होने की बात कहते हुए पद से इस्तीफा दे दिया था।
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