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अमिट है आस्था, खिंचे चले आते हैं श्रद्धालु

Muzaffar nagar

Updated Wed, 28 Nov 2012 12:00 PM IST
शुक्रताल, 27 नवंबर।
कार्तिक पूर्णिमा पर्व पर शुक्रतीर्थ में आने वाले श्रद्धालुओं की आस्था अमिट है। पाश्चात्य संस्कृति और बढ़ते बाजारीकरण के बावजूद तीर्थनगरी में आने वाले श्रद्धालुओं की कोई कमी नहीं है। बीते पांच दशक से तीर्थ दर्शन और गंगा स्नान के लिए पहुंचते हैं। ‘अमर उजाला’ ने मेले में आए श्रद्धालुओं से शुक्रतीर्थ से जुड़ी स्मृतियों को पुन: ताजा किया।
मोरना क्षेत्र के अथाई गांव के नरेंद्र सिंह 50 साल से मेले में आते हैं। जनता इंटर कॉलेज भोपा में पीटीआई रह चुके सिंह का कहना है कि पहले जैसा सेवाभाव और अनुशासन अब नहीं दिखता। नई पीढ़ी धार्मिक श्रद्धा के महत्व को समझे।
मंसूरपुर क्षेत्र के दुधाहेड़ी गांव के अरविंद राठी बताते हैं कि वह तीन दशक से मेले में प्रतिवर्ष आते हैं। पहले रिश्तेदार मेले में ही जुटते थे और दु:ख-दर्द की बातें होती थी। डीजे के संगीत ने मेले की शांति हर ली है।
सिसौली के ब्रह्मसिंह 45 साल पहले मेले में आए थे। तब यहां रेत के टीले पर श्रीशुकदेव मंदिर था। अब मेले में ग्रामीण खेल न होने की कमी खलती है। अबकी बार सुव्यवस्थित मेला लगा है।
पानीपत के कृष्णसिंह का कहना है कि 55 साल पहले यहां न कोई मंदिर का भवन था। वट वृक्ष के नीचे भजन-कीर्तन कर श्रद्धालु गंगा स्नान करते थे।
पानीपत के चतरसिंह का कहना है कि श्रद्धाभक्ति में डूबे श्रद्धालु कार्तिक मेले में 20-20 दिन तक यहीं डेरा जमाए रहते थे। अब तो डुबकी लगाकर कुछ ही घंटों में हर कोई लौटना चाहता है।
सदर क्षेत्र के गांव कूकड़ा के नेपाल सिंह 50 साल से मेले में आते हैं। कहते हैं कि रस्से के सहारे रेत के टीले पर चढ़कर वट वृक्ष की पूजा होती थी। यहां से तीन किमी दूर गंगा बहती थी। हमारे बुजुर्ग बैलगाड़ी से मेले में पहुंचते थे। पुरोहित गोविंदराम शर्मा का कहना है कि उनके पूर्वज 77 साल से श्रीशुकदेव की पूजा-अर्चना में लगे हैं। स्वामी कल्याणदेव की कृपा से तीर्थ की कायापलट हो गई है। रेतीले टीलों पर जंगल में कभी हिंसक जानवर घूमते थे।
कूकड़ा गांव में जयवीर सिंह का कहना है कि वर्षों पहले पैदल रेत में चलकर गंगा तक पहुंचते थे। अब गंगा तीर्थ के करीब बहती है, फिर भी भीड़ के चलते वहां पहुंचना कठिन है।
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