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...तो क्या फिर खेत-खलिहान होंगे जलमग्न

Mirzapur

Updated Sat, 07 Jul 2012 12:00 PM IST
शेरवां। विकास खंड जमालपुर के नहरों की दशा अत्यंत जर्जर होने से किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें बढ़ती जा रही हैं, क्याेंकि अगर भारी बारिश के बाद अहरौरा और जरगो जलाशयों से पानी छोड़ा गया तो खेती-किसानी तो बर्बाद होगी ही साथ ही किसानों के खून-पसीने की कमाई भी मिट्टी में मिल सकती है। जमालपुर के किसानों का मानना है कि अगर सितंबर 2011 के घटना की पुनरावृत्ति हुई तो इसके जिम्मेदार जनप्रतिनिधि और जिला प्रशासन होेंगे।
यदि भारी बारिश के बाद जलाशयों से नहराें में पानी छोड़ दिया जाता है तो किसानों की खेती-किसानी बर्बाद हो जाएगी। बता दें कि अहरौरा और जरगो जलाशय में सितंबर 2011 को भारी बारिश होेने पर जलाशय के लबालब भर जाने के बाद खोले गए गेटों से निकला पानी जमालपुर इलाके में भारी तबाही का कारण बना था। 2011 के पूर्व लगातार पांच वर्ष तक सूखा पड़ने के चलते जमालपुर इलाके की नहरों की साफ-सफाई, खुदाई, जलनिकासी व्यवस्था, पुल-पुलिया और सड़कों के बेतरतीब निर्माण के चलते पांच हजार एकड़ की फसल बाढ़ में बर्बाद हो गई थी। किसानों का दर्द अभी समाप्त भी नहीं हुआ है कि पुन: किसानों के माथे पर बाढ़ की विभिषिका की चिंता सताने लगी है, क्योंकि 2011 की आई बाढ़ के चलते प्राकृतिक नदी गड़ई के तटबंध जगह-जगह आज भी टूटे पड़े हुए हैं। साथ ही जफराबाद-बिक्सी माइनर के साथ ही हुसैनपुर फीडर से निकली जाफरखानी माइनर, यूसुफपुर-गौरी माइनर, भोकानाला, शेरवां माइनर, ओड़ी ड्रैन, कलवरिया नाला, भाईपुर ड्रैन, मदरा-भिलवा बड़ेवला ड्रैन, नकुईया नाला के जल निकासी क्षमता को नहीं बढ़ाया गया तथा माइनरों की दशा ज्यों की त्यों बनी हुई है। इतना ही नहीं प्राकृतिक नदी गड़ई में बहुआर के पास तथा यूसुफपुर स्थित भोकानाला के रेगुलेटर की आयल ग्रीसिंग अभी तक नहीं हो पाई है। विभागीय अधिकारियों की लापरवाही के चलते साथ ही जनप्रतिनिधियों की ढुलमुल नीति के चलते हाड़तोड़ मेहनत करने वाला किसान हर साल अपनी बर्बादी का मंजर अपनी आंखों से देखकर अपने सीने पर पत्थर रखकर संतोष करता है। चुनाव के समय विधायक और सांसद बनने की होड़ में लगे नेताआें द्वारा जमालपुर को बाढ़ मुक्त इलाका घोषित करने के नाम पर छलपूर्वक वोट लेने का काम किया गया। किसानों का मानना है कि अगर भारी बारिश के बाद जलाशयों से नहराें में पानी छोड़ दिया जाता है तो किसानों की खेती-किसानी बर्बाद हो जाएगी, जिसके जिम्मेदार जनप्रतिनिधि व सिंचाई विभाग के आला अधिकारी हाेंगे। इस संबंध में इलाके के किसानों ने जनप्रतिनिधियाें को समस्या से निदान कराने के लिए लिखित सूचना दे चुके हैं। प्रकृति अगर अगस्त माह से अपनी लीला दिखानी शुरू करती है तो किसानाें को एक बार फिर अपने खून पसीने की कमाई को गवांना पड़ेगा, क्योंकि ऐसी स्थिति में जलाशयों के फाटक जरूर खोले जाएंगे और किसानों की खेती किसानी बर्बाद हो जाएगी।
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