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जैव सूचनाओं के आदान-प्रदान से होगा कृषि उन्नयन

Mau

Updated Thu, 06 Dec 2012 05:30 AM IST
मऊ। परदहा ब्लाक क्षेत्र के कुशमौर स्थित राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो में आयोजित राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला के दूसरे दिन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक पौध संरक्षण डा. टीपी राजेंद्रन ने प्रतिभागी वैज्ञानिकों को संबोधित किया। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के बारे में विस्तार से प्रकाश डाला।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद नई दिल्ली के सहायक महानिदेशक डा. टीपी राजेंद्रन ने कहा कि जैव सूचना प्रौद्योगिकी भविष्य में वैज्ञानिकाें के हाथों में एक कंयूटरकृत हथियार है। जिसके माध्यम से जैविक जगत में व्याप्त सूचनाओं का अनुक्रमण एवं विश्लेषण किया जा सकता है और उपलब्ध सूचनाओं के माध्यम से सूक्ष्मजीव आधारित फसल प्रबंधन एवं उन्नयन किया जा सकता है। डा. राजेंद्रन ने कहा कि सूक्ष्मजीवी प्राय: सभी प्रकार की पारिस्थितिक तंत्र में व्याप्त है और अपनी वृहतर उपयोगिताओं से मिट्टी में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश के संरक्षण और संवर्धन के लिए जिम्मेदार है। इन्हीं जीवाणुओं से पौधों की जड़ों में नाइट्रोजन, फास्फोरस एवं पोटाश का विलयन तथा स्थिरीकरण होता है। जिससे पौधे स्वच्छ एवं समृद्ध बने रहते हैं और अच्छी उत्पादकता प्रदान करते हैं। वर्तमान में बायोइंफार्मेटिक्स के उपयोग से कृषि में पौधे स्वस्थ एवं रोग प्रबंधन हेतु कंप्यूटरकृत माडल विकसित किया जा रहा है। इससे पौधों के स्वास्थ्य उनकी जड़ों में उपलब्ध सूक्ष्मजीवों की संख्या आदि पर पड़ने वाले वातावरणीय कारकाें जैसे जलवायु परिवर्तन आदि का अध्ययन किया जाता है। डा. राजेंद्रन ने ब्यूरो को सूक्ष्म जीवों के संरक्षण हेतु विकसित किया गया बैंक बताया। इसमें कृषि उपयोगिता अनेकानेक जीव संरक्षित हैं। निदेशक डा. अरूण कुमार शर्मा ने कहा कि अपनी गुणवत्तापूर्ण एवं कृषि उपयोगी कार्यों के चलते राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो वैज्ञानिक जगत में अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। ब्यूरो में संकलित और संरक्षित 4500 सूक्ष्मजीवों में अनेकों जीव कृषि जगत में जैव उर्वरक एवं जैव फफूद कीटनाशक के रूप में विकसित करने की क्षमता रखते हैं। इनका उपयोग किसानों कें हित में व्यापक रूप से किया जा सकता है। राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला के संयोजग डा. डीपी सिंह ने कहा कि सूचना प्रसार आणविक जीव विज्ञान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जिसे बिना जीनोमिक्स, प्रोटीओमिक्स एवं मेटाबोलोमिक्स जैसे जटील विषयों पर कार्य करना असंभव सा है। डा. सिंह ने बताया कि बायोइंफारमेटिक्स के प्रयोग से जीव जगत की कोशाओ में सतत रूप से चल रही जैव रासायनिक जगत में आए बदलाव का अध्ययन किया जा सकता है। संचालन डा. आलोक श्रीवास्तव ने किया।
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