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राम और रहीम के नुमाइंदों ने दिया अमन का पैगाम

Mau

Updated Sat, 27 Oct 2012 12:00 PM IST
पुष्पेन्द्र कुमार त्रिपाठी
मऊ। परंपराओं के पुराने शहर में राम और रहीम के नुमाइंदों ने भरत मिलाप के दौरान एक बार फिर अमन और शांति का पैगाम दिया। खासतौर से ऐसे समय में जब पास में ही स्थित फैजाबाद उपद्रव की हिंसा में जल रहा है। वहीं मऊ के शाही कटरा मैदान में हर-हर महादेव और अल्लाहो-अकबर की गूंज के बीच जब राम-लक्ष्मण-भरत-शत्रुघभन आपस में गले मिले तो एक बार फिर यह पुख्ता हो गया कि सदियों पुराने शहर की फिजा में सिर्फ सौहार्द की बयार बहती है। इस भाई चारगी को देख कर शहर के पुरनियों के मुंह से बरबस ही निकल पड़ा कि मऊ सदैव गंगा-जमुनी तहजीब का अलमबरदार बना रहेगा।
मान्यताओं के अनुसार नगर क्षेत्र के शाही कटरा मैदान में लगभग चार सौ वर्षों से ज्यादा समय से भरत मिलाप का आयोजन किया जा रहा है। वर्षों पुरानी समूची रामलीला परंपराआें से घिरी हुई है। इसके चलते परंपराओं का निर्वहन कराने के लिए रामलीला समिति प्रशासन पर खासा दबाव भी बनाए रहती है। लेकिन पूरे आयोजन में चाहे वह मारीच वध हो या पुष्पक विमान के शाही कटरा पहुंचने का समय। रामलीला के प्रति मुस्लिम बंधुओं के सहयोग को देख कर यह सहज ही प्रतीत हो जाता है कि नगर के दोनों समुदायों के संबंधों की जड़ें बेहद गहरी हैं। राम जिस वक्त भरत से मिलने आते हैं, उसी समय मुस्लिम बंधु शाही मस्जिद में नमाज अदा करते हैं। इसी तरह पुष्पक विमान का मस्जिद से छुआया जाना भी आपसी समरसता के समृद्ध इतिहास को बयां करता है। बदलते समय के साथ लोगों ने इन सब परंपराओं के मायने भी अपने हिसाब से तय कर लिए। लेकिन शुक्रवार की भोर में भरत मिलाप के दौरान मस्जिद के चौतरफा स्थित मकानों की छतों पर मुस्लिम परिवारों की भारी भीड़ इकट्ठा थी। जो यह बताने के लिए काफी है कि वक्त बदलने के साथ आपसी संबंध और संस्कृति नहीं बदलती हैं। बुरी नीयत के लोग जितनी चाहे कोशिश कर लें। लेकिन मऊ मजहबी एकता और आपसी समरसता के केंद्र के रूप सदैव जाना जाएगा।

मुस्लिम बंधुओं ने कराया जलपान
मऊ। गुरुवार की रात को भरत मिलाप कार्यक्रम में मुस्लिम बंधुओं ने पूरी रात जागकर लोगों को चाय-पानी कराया। बताया जाता है कि एक जमाने में इस परंपरा की नींव मल्लिका रोशन आरा ने रखी थी। वह आपसी सौहार्द को कायम रखने के लिए अपने महल के सामने ही रामलीला का मंचन कराती थी। तभी से इस नगर में आपसी सौहार्द के रूप में परंपरा का निर्वहन होता चला आ रहा है।

क्या जारी रहेगी नारदीय गाने की परंपरा?
गायक मंडली के सभी सदस्य हैं उम्र के आखिरी पड़ाव पर
मऊ। भरत मिलाप समेत अन्य कई धार्मिक आयोजनों में नगर में नारदीय गाने की प्रथा है। जरूरत है कि आगे भी यह परंपरा जारी रहे। शुक्रवार की भोर में राम और भरत के मिलाप से पहले नारदीय गाने वालों ने अपनी परंपरा का निर्वहन इस वर्ष भी जारी रखा। राम-भरत मिलाप में भगवान का विमान जब शीतला माता धाम से चलता है और जब तक भरत से राम का मिलन नहीं हो जाता है। तब तक नारदीय गाई जाती है। नारदीय प्रभु भक्ति की वह कला है जिसमें समय के हिसाब से राग और सुर तय होता है। इसमें शुद्ध हिंदी और संस्कृत के शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इस कला के जरिए सूरदास, तुलसी और कबीर के दोहों और रचनाओं के जरिए प्रभु की महिमा का बखान किया जाता है। शीतला धाम से चलने के बाद विमान कई स्थानों पर रुकता है। जिसमें हर स्थान पर नारदीय होती है। कभी नारदीय गाने वालों की छह-छह टीमें थी। आज यह सिमट गई है। मात्र दो बची है। नारदीय गाने वाले सभी उम्र के आखिरी पड़ाव पर है। ऐसे में प्रशभन उठता है कि आने वाले समय में क्या यह प्रथा सुरक्षित रह पाएगी। हालांकि नारदीय गाने वालों का दावा है कि वे अगली पीढ़ी को तैयार कर रहे है। बहरहाल ये आने वाला वक्त बताएगा कि राजकुमार उपाध्याय, त्रिलोचन उपाध्याय, विनोद, बृजेश, प्रमोद, श्रीराम आदि के द्वारा जारी परंपराओं की हिफाजत कैसे होती है।
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