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बालक-वृद्ध की सेवा सबसे बड़ा तप

Mau

Updated Sat, 06 Oct 2012 12:00 PM IST
मधुबन। सुल्तानपुर बारहगांवा के मैदान में चल रही रामकथा के सातवें दिन कथावाचक प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि राम का नाम हृदय में बस जाए तो तो निद्रा को भी तंद्रा में बदल देना चाहिए। बालक व वृद्धों की सेवा करें तो उससे बढ़कर कोई तप नहीं है। इससे भगवान की कृपा आप पर और बढ़ेगी। राम का नाम ऐसा है जो हृदय में रख ले और जो न कभी सड़ेगा न गलेगा तो उसका मय जीवन प्रकाश से भर जाएगा। धन में कभी शांति की तलाश नहीं करनी चाहिए। क्योंकि वहां शांति है ही नहीं, शांति केवल श्री चरणों में है। धर्म से गुजर कर जो धन आवेगा उसी से सुख शांति और समृद्धि मिल सकती है। धन से मन बढ़ता है और धर्म से पाप मिट जाता है और मानव को वही संग्रह करना चाहिए जो सदैव बना रहे।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम चित्रकूट पहुंचते हैं जहां बाबा बाल्मिकी जी ने भगवान श्रीराम, सीता और लक्ष्मण को चित्रकूट की सैर कराते हैं। भगवान को जगह पसंद आती है। तुरंत स्थापत्य के देवता विश्वकर्मा जी को बुलाया गया भव्य कुटिया का निर्माण कर दिया। भगवान राम वहां कुछ दिन बिताते हैं। उधर भगवान राम सुमंत को अयोध्या वापस भेज देते हैं। चित्रकूट में भगवान राम सुमंत को अयोध्या वापस भेज देते हैं। उधर चित्रकूट में भगवान कोल भील आदि के संग इतने रम जाते हैं कि कितना समय गुजर गया पता नहीं चला। प्रेमभूषण महाराज ने कहा कि जो चीज देखने में सरल लगती है वास्तव में वो सरल नहीं है। महाराज युधिष्ठिर को केवल सत्यम वद को सीखने में 30 दिन लग गए थे। धर्मम चल कहने में तीन माह का समय लग गया था। हर व्यक्ति चाहता है कि लोग हमसे प्रेम करें तो सबसे पहले उसे भी प्रेम की परिभाषा सीखनी पड़ेगी। यह तभी संभव होगा जब हमारे हित में राम बसेंगे। गैरों की निंदा करना हमारा स्वभाव है। मगर हम अपने अंदर की बुराई को नहीं ढूंढ पाते है। अगर मानव ढूंढ ले तो जीवन धन्य हो जाएगा। उन्होंने कहा कि जाना एक अवस्था है और जीना एक व्यवस्था है। सुमंत अयोध्या आते हैं चक्रवर्ती राजा दशरथ को राम का पूरा वृतांत सुनाते हैं उधर राम का नाम लेकर राजा दशरथ महाप्रयाण करते हैं पूरी अयोध्या नगरी में शोक की लहर दौड़ जाती है। महाराज भरत को राजगद्दी के लिए माता कैकेयी और मंथरा व्याकुल हैं। लेकिन भरत ने पहले श्रीराम के चरणों में जाना और उन्हें वापस लाकर राजगद्दी सौंपना फर्ज समझते हुए चित्रकूट की ओर चल देते हैं।
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