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मन से करनी चाहिए भगवान की सेवा

Mau

Updated Fri, 05 Oct 2012 12:00 PM IST
मधुबन। क्षेत्र के सुल्तानपुर बारहगांवा में चल रही रामकथा के छठवें दिन कथावाचक प्रेमभूषण महाराज ने धनुष यज्ञ प्रसंग का उद्धरण देते हुए कहा कि भगवान श्रीराम धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाकर मां सीता स्वयंवर रचाकर गुरु विश्वामित्र के साथ सभी लोग मां सीता को लेकर अयोध्या पहुंच चुके है। भव्य आयोजन होता है। अयोध्यावासी अयोध्या को फूलों से सजाकर खुशियां मनाते हैं।
उन्होंने कहा कि मानव को अपने जीवन में ऐसा कुछ कर्म कर लेना चाहिए जो जाने के बाद भी लोगों को स्मरण रहे। हिरण्यकश्यप ने भगवान से चार घंटे तक वरदान मांगता रहा। जहां-जहां से सुरक्षित रहे वर मांगता रहा। भगवान ने उसे दिया भी, लेकिन अहंकारवश धर्म को भूल गया। उसे भी जाना पड़ा। महाप्रतापी रावण जिसकी सुरक्षा अभेद्य थी। बल और तप से सभी को अपने वश में कर लिया था। अभिमान में जी रहे रावण को भी शरीर छोड़कर जाना पड़ा। इसलिए हे मानव तुम राम के सामने झोली फैलाओ वो तेरी झोली खुशियों से भर देगा। मानव को भगवान की सेवा मन से करनी चाहिए। क्योंकि मन से श्रेष्ठतम सेवा है। तन की सेवा में तन तो यहां रहता है, लेकिन मन और कहीं रहता है। धन से सेवा करने के बाद हम भगवान से अलग हो जाते हैं। जैसे फल के लिए पैसा दिए हम अपने रास्ते वो अपने रास्ते। प्रेमभूषण जी ने कहा कि इस कलियुग में हमें जो मिला है उसी पर संतोष व धर्म का पालन करना चाहिए। प्रभु से प्रार्थना करें कि हे प्रभु जब भीष्म जन्म लें तब-तब हम आपकी सेवा में रहें। भगवान का भजन, भक्ति, विद्या बोध का बंटवारा कोई नहीं करा सकता। जबकि धन संपत्ति जो हमारी कभी नहीं रही उसके लिए व्यक्ति लड़ता रहता है। उन्होंने कहा कि कोई भी व्यक्ति किसी पर उपकार करें तो उसे धन्यवाद बोलना चाहिए। जिससे उसका मनोबल बढे़ और वह दूसरों के साथ उपकार करे। परमात्मा इतने कृतज्ञ हैं कि जो उन्हें थोड़ा भी स्मरण कर लेता है वो उनके लिए अनन्य भक्त भक्त बन जाते हैं। गुरु विश्वामित्र जाते समय चक्रवती सम्राट राजा दशरथ से आज्ञा मांगते हैं तो राजा दशरथ चरणोें में झुककर प्रणाम करने के बाद पत्नी, बच्चों, सहित आपका कृतज्ञ हूं। हम सभी पर कृपा बनाएं रखें। उन्होंने कहा कि जो सद्ग्रथों में लिखा है उसे सुनकर स्मरण करना चाहिए।


जिसके पास धर्म है उस पर सदा भगवान की कृपा बनी रहती है। प्रभु ने कहा है कि मानव जीवन अनमोल है। अगर पुष्प बनकर न रह सको तो कांटे बनकर भी न रहें। बच्चों के बचपन की उद्डता को रोकना चाहिए।
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