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सचिवों की हड़ताल जारी, यूरिया को मारामारी

Mau

Updated Sun, 02 Sep 2012 12:00 PM IST
मऊ। धान की फसल के पीक आवर में खाद वितरण में प्रशासन गंभीर नजर नहीं आ रहा है। सचिवों की हड़ताल शुरू हुए 17 दिन बीत गए लेकिन प्रशासन की ओर से वैकल्पिक खाद वितरण की व्यवस्था अब तक नहीं की जा सकी है। सहकारिता विभाग ने भी न्याय पंचायत स्तर पर खाद वितरण कराने के बजाय अगस्त में मिली अपने हिस्से की यूरिया और डीएपी, एनपीके को पीसीएफ, डीसीएफ सहित अन्य केंद्रों को जारी कर दिया। हालत यह है कि अधिकांश केंद्रों पर यूरिया नदारद है। अभी सितंबर में खाद का आवंटन नहीं किया जा सका है। खाद की उपलब्धता सुनिश्चित न होने से निजी दुकानदारों की खूब चांदी कट रही है। वह मनमाने दाम पर यूरिया सहित अन्य उर्वरक बेच रहे हैं। किसानों की शिकायत के बाद भी अधिकारी मौन हैं।
सचिवों की हड़ताल के बाद खाद वितरण की वैकल्पिक व्यवस्था न होने से किसानों की परेशानी बढ़ती ही जा रही है। इस समय यूरिया की मांग है। हालत यह है कि अधिकांश पीसीएफ, डीसीएफ, एग्रो सहित अन्य केंद्रों पर यूरिया ही नहीं है। कुछ केंद्रों पर अगस्त की जारी डाई और एनपीके बचा है। सभी न्याय पंचायत स्तर खाद की उपलब्धता न होने से निजी दुकानदार किसानों से मनमाना दाम वसूल रहे हैं। किसानों को खाद की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए जनपद मेें 92 साधन सहकारी समितियां, 10 पीसीएफ, 10 डीसीएफ, क्रय विक्रय के तीन, इफ्को के एक, एग्रो के दो की स्थापना की गई है। अधिकारियों के अनुसार अब तक 18076 एमटी यूरिया के सापेक्ष 14627 एमटी यूरिया की आपूर्ति की जा चुकी है। सचिवों की हड़ताल के चलते सहकारिता की 2625 एमटी यूरिया तथा 1260 एमटी डीएपी 10 पीसीएफ, 10 डीसीएफ, क्रय विक्रय के तीन, इफ्को के एक, एग्रो के दो को भेज दिया गया। जबकि 1459 एमटी यूरिया निजी उर्वरक केंद्रों से वितरित कराई जा रही है। यूरिया की रैक न आने से अभी सरकारी एजेंसियों को जारी ही नहीं किया जा सका है। खाद की पर्याप्त उपलब्धता न होने से निजी दुकानदार किसानों से 400 रुपये प्रति बोरी तक वसूल रहे हैं। परेशान किसान थक हारकर अधिक दाम देने को विवश हैं। सिपाह इब्राहिमाबाद संवाददाता के अनुसार पीसीएफ पर खाद न होने से ताला लटक रहा है। किसान दर-दर भटक रहे हैं। मधुबन संवाददाता के अनुसार कटघरा शंकर स्थित पीसीएफ केंद्र पर डाई व एनपीके तो है, लेकिन यूरिया की उपलब्धता ही नहीं है। अधिकांश इलाकों का यही हाल है।
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