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पैदा होकर आखिर जी रहे किसलिए ...

Mau

Updated Sun, 05 Aug 2012 12:00 PM IST
मऊ। ‘पढ़य के मन त कराला, पय हमार बाऊ कहलन के का करबे पढि़ के। हमरे पास ऐतना पैसा ना हौ के तोहरे खातिन किताब और कपड़ा कीनीं। कुछहू काम-धंधा सीख लेबे ता दुय पैसा के आदमी हो जइबे।’ सात वर्षीय अरुण केे ये शब्द विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीटने वाली लोकतांत्रिक सरकारों के लिए एक आइने की तरह हैं। देश को आजादी मिले लगभग उतने साल तो हो ही गए जितनी हमारे देश के एक आदमी की औसत आयु होती है। लेकिन आज भी शहर के रेलवे स्टेशन, बस अड्डे के किनारे, ओवरब्रिजों के नीचे और शहर का कूड़ा-करकट फेंकने वाली जगहों पर गंदगी के बीच शान से झुग्गियां ताने ऐसे सैकड़ों परिवार मिल जाएंगे जिन्हें शायद सरकार नाम के शब्द की कोई उपयोगिता और महत्व ही नहीं पता है।
अमूमन सरकारें आए दिन किसी न किसी कल्याणकारी योजना की घोषणा देश और प्रदेश की राजधानियों से करती रहती हैं। लेकिन उन योजनाओं का लाभ समाज में किसे कितना मिल पाता है यह गौर करने वाली बात है। अगर योजनाएं, उनको बनाने वाली सरकारें और सरकारों के नुमाइंदे आमजन के लिए थोड़े भी फिक्रमंद होते तो शहर के रेलवे मैदान की चहारदीवारी के पास बने फुटपाथ पर, रेलवे परिसर में, गाजीपुर तिराहे से बुनाई विद्यालय तक और भीटी रेलवे पुल के नीचे गंदगी और बजबजाती नालियों के बीच शान से बिना बिजली और पानी के झोपडि़यों में सैकड़ों परिवार अपनी जिंदगी न बिता रहे होते। पैदा होने से मरने के बीच जनता के प्रति सरकार की क्या-क्या जिम्मेदारियां है यहां रहने वालों को कुछ पता ही नहीं। झुग्गियों के इन बाशिंदों के बच्चे सर्व शिक्षा अभियान जैसी योजनाओं से अछूते रहकर या तो भीख मांगते हैं, या कूड़ा बीनने का काम करते हैं। यहां रहने वाले जन्म-मृत्यु के पंजीकरण के झंझट से बचे हैं तो वृद्धा पेंशन, इंदिरा आवास और बीपीएल जैसे कार्ड क्या होता है, नहीं जानते। बीमार पड़ते हैं तो इनके अपने देशी नुस्खे हैं, आखिर अस्पताल जाने पर दवाइयां पैसे से ही खरीदनी पड़ती हैं ना। सरकारी नुमाइंदा कभी इनके पास नहीं आता है। साहबों के सामने जाने से इनके पांव थरथराते हैं। डीसीएसके कालेज के सामने पिछले पचास वर्षों से झोपड़ी में जीवन बिताने वाले जितेंद्र डोम के परिवार ने बताया कि, बस जी रहे हैं। लेकिन यह नहीं पता क्यूं जी रहे हैं। शायद मां-बाप ने पैदा कर दिया इसीलिए। इसी तरह मुन्नू, राजू, मनोहर, प्यारे आदि समेत सैकड़ों परिवारों का यही कहना है कि भैया सरकार को हम क्या जानें। हमारे जिंदगी की शुरुआत सुबह होती है और रात में खत्म हो जाती है। बहरहाल इस अंतहीन कथा का कोई अंत भले ही ना हो, लेकिन सरकारें और उनके नुमाइंदे अपने ही संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों की ऐसे कैसे अनदेखी कर सकते हैं, यह गंभीर प्रशभन है। गौरतलब है कि भारतीय संविधान में प्रदत्त मूल अधिकार में अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में उच्चतम न्यायालय ने मानवीय गरिमा युक्त जीवन की बात कही है। हालांकि जब इस बाबत एडीएम पीपी सिंह से पूछा गया तो उन्होनें बताया कि, सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना इसी उद्देश्य से कराई जा रही है ताकि ऐसे वंचितों को चिह्नित करके उन्हें विभिन्न सरकारीे योजनाओं का लाभ दिलाया जा सके।
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