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बेहिसाब वाहनों के बीच चंद ट्रैफिक कर्मी

Mathura

Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
मथुरा। 25,00000 की आबादी वाले जनपद में यातायात को सुचारु रूप से चलाने के लिए जितनी यातायात पुलिस की आवश्यकता है। उसके मुकाबले में पुलिस की संख्या काफी कम है।
जनपद में जिस तेजी से जनसंख्या में बढ़ोत्तरी हुई है उसी तेजी से सड़कों पर वाहनों का दबाव भी बढ़ रहा है। इसके साथ ही व्यस्त चौराहों और तिराहों की संख्या में काफी वृद्धि हो चुकी है। यहीं नहीं जनपद में आने वाली वीआईपी और आए दिन निकलने वाली शोभा यात्राओं के दौरान भी यातायात पुलिस की आवश्यकता पड़ती है लेकिन पुलिस के लिए यह सब मैनेज करना आसान नहीं है।
यातायात पुलिस कर्मियों की कमी इस काम में सबसे बड़ी बाधा है। इस कारण जनपद की ट्रैफिक व्यवस्था पूरी तरह से चरमराई हुई है। ट्रैफिक पुलिस की कमी के चलते रैगुलर चेकिंग अभियान भी शहर में नहीं चल पाता है। इससे अतिक्रमण करने वाले और सड़क किनारे गलत तरीके से वाहन खड़े करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई भी नहीं हो पाती।

कुल 45 का है स्टाफ
मथुरा (ब्यूरो)। जनपद यातायात पुलिस की संख्या कुछ इस तरह है। जो ट्रैफिक को नियंत्रित कर रही है।
45 ट्रैफिक पुलिस कर्मचारियों का स्टाफ है।
27 ट्रैफिक पुलिस के सिपाही हैं।
15 में छह एचसीपी और नौ हैड कांस्टेबल हैं।
3 टीएसआई हैं।

13 सिपाहियों के हवाले शहर का यातायात
मथुरा (ब्यूरो)। ट्रैफिक पुलिस के 27 सिपाही इस तरह ड्यूटी करते हैं। दो सिपाही कार्यालय में और तीन टीएसआई के साथ ड्यूटी करते हैं। चार से लेकर पांच सिपाही छुट्टी पर रहते हैं। चार सिपाहियों को वृंदावन ड्यूटी के लिए भेजा जाता है। इस तरह कुल 13 सिपाहियों के हवाले शहर की यातायात व्यवस्था रहती है।

अपने खर्चे पर जाते वृंदावन
मथुरा (ब्यूरो)। यातायात पुलिस के सिपाहियों को वृंदावन ड्यूटी को आने जाने के लिए न तो बाइक का पेट्रोल मिलता है और न वहां तक पहुंचने के लिए वाहन का किराया।

दबाव बन जाता कार्रवाई में रोड़ा
मथुरा (ब्यूरो)। ट्रैफिक पुलिस को वाहन चेकिंग के दौरान तरह-तरह के दबावों का सामना करना पड़ता है। चेकिंग के दौरान ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करते किसी वाहन चालक को रोकते ही ट्रैफिक पुलिस के पास अधिकारियों और राजनेताओं के फोन आने शुरू हो जाते हैं। दबाव में आकर नियमों का उलंघन करने वाले को भी ट्रैफिक पुलिस को छोड़ना पड़ता है।
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