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जिंदगी जिंदादिली का नाम है...

Mathura

Updated Sat, 01 Dec 2012 12:00 PM IST
मथुरा। इनकी कहानी वहां से शुरू होती है जहां जिंदगी की खुशियां खत्म होती हैं। अंधेरे में रोशनी की तलाश में ये न सिर्फ जी रहे हैं बल्कि और को भी जीने की राह दिखा रहे हैं। लाइलाज बीमारी जिसकी मंजिल सिर्फ मौत है उसे भूल खुशी के हर पल को जिंदगी की बांहों में समेटने की भरपूर ख्वाहिश लेकर जिंदादिली संग जी रहे कान्हा की नगरी के लोग इक मिसाल हैं। बस जरूरत है कि समाज इन्हें अपनाए और आगे बढ़ने का सहारा दे।
आंसुओं संग छलका जीवन का दर्द...
जब एक एचआईवी पॉजिटिव महिला से उसकी इस लाइलाज बीमारी की बात की गई तो उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। कान्हा की क्रीड़ास्थली की रहने वाली इस महिला के तीन छोटे-छोटे बच्चे हैं। जब वह तीसरी बार गर्भवती हुई तो उसके रक्त की जांच डॉक्टर ने कराई। इसके बाद वह एचआईवी पॉजेटिव निकली। वह इस बीमारी के बारे में तब जानती भी नहीं थी। उसे समझ नहीं आ रहा रहा था कि आखिर यह रोग उसे लगा कैसे। महिला ने बताया कि पति और सास ने काफी समझाया तब से नियमित इलाज चल रहा है। आज घर वालों के सहयोग से ही जिंदगी आगे बढ़ रही है।

मैने किसी को नहीं बताया...
शहर के एक रोगी ने बताया कि उन्हें काफी समय से बीमार रहने के बाद खून की जांच में पता चला की एड्स नामक बीमारी है। उन्होंने कहा कि तमाम जागरूकता अभियानों के बावजूद लोग एड्स पीड़ित को सम्मान नहीं देते हैं, इसलिए मैं किसी को अपनी बीमारी के बारे में नहीं बताता हूं। इससे मेरे परिवार को भी कोई उपेक्षा की नजर से नहीं देखता।

...तब लगा कि किसी ने बांध दिए पैर
नदी के उस पर के इलाके के एड्स पीड़ित ने बताया कि जब एड्स पीड़ित होने की जानकारी मिली तो जीवन की नैया भंवर में फंसती नजर आई। रिपोर्ट लेकर घर जाना मुश्किल हो गया। चला नहीं जा रहा था, लगता था कि पैर किसी ने बांध दिए हैं। जैसे तैसे घर पहुंचकर खुद को संभालने का प्रयास किया। तभी से लगातार मेरी दवा चल रही है।

संस्थान ने निकाला, पत्नी ने संभाला...
प्रमुख मंदिर से एक धार्मिक स्थल जाने वाले रोड के एड्स पीड़ित शिक्षा से जुड़े हैं। जहां वह शिक्षा का कार्य करते थे उस संस्थान ने एड्स रोग का पता लगते ही उन्हें निकाल दिया था। इसके बाद वह 15 दिन तक सदमे में रहे। वह कहते हैं कि तब परिवार के किसी व्यक्ति से बातचीत नहीं की। ऐसे बुरे वक्त में उन्हें उनकी पत्नी ने संभाला। पत्नी ने कहा कि शरीर में रोग तो लगते ही रहते हैं कोई चिंता की बात नहीं है।

यहां जीने की राह...
पॉजिटिव पीपुल वेलफे यर सोसायटी एड्स पीड़ितों के लिए कार्य करती है। इसके अध्यक्ष अजय सिंह ने बताया कि उनकी संस्था हर पल मौत के करीब जा रहे लोगों के मन में जीने की ललक पैदा करने की हर मुमकिन कोशिश करती है। पहले रोगी जांच कराकर शर्म और भय के कारण दवा नहीं कराते थे। इसके फलस्वरूप कई रोगियों की असमय मौत हो जाती थी। अब हालात जुदा हैं। जिला चिकित्सालय से अब पीड़िताें को उनके पास काउंसिल के लिए भेजा जाता है। संस्था में लोगों को समझाकर आगरा एआरटी से जोड़कर उनकी दवा शुरू कराई जाती है। सिंह बताते हैं कि उनकी संस्था 2008 से अब तक 870 एड्स पीड़िताें को जोड़ चुकीहै।

इलाज की सरकारी नीतियां कारगार नहीं
सुप्रीम कोर्ट के आदेश हैं कि सभी प्राइवेट और सरकारी अस्पतालाें में एड्स रोगियाेंका इलाज किया जाएगा लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है। सरकारी अस्पताल में रोगियों की सर्जरी की कोई व्यवस्था नहीं है। राज्य एड्स नियंत्रण सोसायटी के आदेश के बावजूद अभी तक लिंक एआरटी सेंटर की स्थापना नहीं हो सकी है। जिससे की एचआईवी पॉजिटिव पीड़िताें का सीडीफोर नहीं हो पा रहा है। इसके तहत रोगी की रोग प्रतिरोधक क्षमता की जांच की जाती है।

अज्ञानता से बढ़ी रोगियाें की संख्या
एकीकृत परीक्षण और परामर्श काउंसलर नीरज कुमार मीणा ने बताया कि दिन प्रतिदिन एड्स रोगियों की संख्या मेें बढ़ोत्तरी हो रही है। जागरूकता और जानकारी के अभाव में यह संख्या तेजी से बढ़ रही है। कई बार चिकित्सा में सावधानियां न रखने के कारण भी एड्स के मरीज बढ़ जाते हैं।

कैसे फैलता है एचआईवी
- एचआईवी संक्रमित व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाने से।
- संक्रमित रक्त या रक्त उत्पाद के चढ़ाए जाने से।
- संक्रमित सुइयाें एवं सिरिंजाें के साझा प्रयोग से।
- संक्रमित मां से उसके होने वाले बच्चे को।

जिले में अब तक 890 एचआईवी पॉजिटिव की पहचान
2002 21
2003 31
2004 41
2005 28
2006 28
2007 75
2008 108
2009 124
2010 148
2011 120
2012 166
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