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कई बार बनी और मिटी है कान्हा की प्राकट्यस्थली

Mathura

Updated Fri, 10 Aug 2012 12:00 PM IST
मथुरा। कान्हा की प्राकट्यस्थली का अस्तित्व कई बार बना और मिटा है। मथुरापति कंस के कारागार से लेकर इस स्थल ने अब के आधुनिक मंदिर तक लंबा सफर तय किया है। तमाम झंझावतों के बाद वर्तमान श्रीकृष्ण जन्मस्थान पूरी जगमग के साथ कान्हा के एक और प्राकट्योत्सव की बाट जोह रहा है।
विद्वानों के मत के अनुसार आधुनिक कटरा केशव ही वह स्थान माना जाता है जहां मथुरापति कंस का कारागार था। यहीं देवकीनंदन भगवान कृष्ण का जन्म हुआ। यह स्थल सदियों से बार-बार बनाया और मिटाया जाता रहा है। इस स्थान पर सबसे पहला मंदिर भगवान कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने आराध्य की अर्चना के लिए बनवाया था। कालांतर में यह विलुप्त हो गया। ईसा पूर्व महाक्षत्रप सोडाष के राज में श्रीवसु नामक व्यक्ति ने श्रीकृष्ण प्राकट्य स्थली पर एक मंदिर, तोरणद्वार और वेदिका का निर्माण कराया। तीसरी बार बड़ा मंदिर सन 400 ईसवी में सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य के समय बना।
1017 ईसवी में इसका ध्वंस महमूद गजनवी ने किया। मंदिर परिसर की खुदाई में मिले सन् 1150 ईसवी के शिलालेख से पता चलता है कि राजा विजयपाल देव के काल में जज्ज नामक व्यक्ति ने इस स्थान पर भव्य मंदिर बनाया। उस समय चैतन्य महाप्रभु भी मंदिर आए थे। चैतन्य चरितामृत में इसका जिक्र है। 16वीं सदी में दिल्ली के सुल्तान सिकंदर लोधी ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया। सवा सौ साल बाद जहांगीर के शासन में ओरछा नरेश राजा वीर सिंह जूदेव ने इस स्थान पर मंदिर बनवाया। 1669 में मुगल सम्राट औरंगजेब ने इसे नष्ट कर दिया। सन् 1943 में महामना पं. मदन मोहन मालवीय यहां श्रीकृष्ण जन्मभूमि के खंडहर देखकर व्यथित हो गए।
इस बीच आए उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला ने इस मामले में महामना को पत्र लिखा। इसके बाद बनारस के राजा पटनीमल के तत्कालीन उत्तराधिकारियों से कटरा केशवदेव सात फरवरी 1944 को खरीद लिया। अभी पुनरोद्धार की योजना बन ही रही थी कि महामना का निधन हो गया। बिड़लाजी ने इस मामले में अधिवक्ता द्वारिकानाथ भार्गव से परामर्श कर श्रीकृष्ण जन्मभूमि न्यास ट्रस्ट की स्थापना की। कई मुकद्दमे लड़ने के बाद सन् 1953 में निर्माण कार्य शुरू हुआ।
पोद्धारजी की यात्रा से आई निर्माण में तेजी
मथुरा (ब्यूरो)। सन 1965 में 600 शिष्यों के साथ मथुरा आए कल्याण पत्रिका के संपादक हनुमान प्रसाद पोद्धार भी मंदिर की दुर्दशा से व्यथित थे। उन्होंने विष्णु हरि डालमिया के पिता जयदयाल डालमिया से मद्द मांगी। इसके बाद मंदिर निर्माण में तेजी आई। गर्भगृह में कान्हा के बाल स्वरूप की मूर्ति बिड़लाजी ने ही दी थी। मंदिर के विग्रह की प्राण प्रतिष्ठा 29 जून 1975 ईसवी में हुई। इसका उद्घाटन पोद्धारजी ने किया। तदोपरांत जुगल किशोर बिड़ला की प्रेरणा से जन्मस्थान परिसर में 11 फरवरी 1965 में भागवत् भगवन का शिलान्यास किया गया। जो 17 वर्षों में पूर्ण हुआ।
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