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कानून के साथ सोच में बदलाव की भी जरूरत

Mainpuri

Updated Thu, 30 Aug 2012 12:00 PM IST
मैनपुरी। भारतीय संस्कृति में मां-बाप को भगवान का दर्जा दिया गया है, लेकिन बदले परिदृश्य में अब सरकार को मां-बाप की उपेक्षा करने पर कानून बनाकर सजा का प्रावधान करना पड़ रहा है। पुत्रों द्वारा मां-बाप को असहाय छोड़ने के बढ़ते मामलों के मद्देनजर प्रदेश सरकार द्वारा माता-पिता का भरण पोषण और कल्याण अधिनियम लागू किए जाने का जहां स्वागत किया जा रहा है, वहीं कई बुद्धिजीवियों का कहना है कि कानून के साथ सोच बदलने की दिशा में भी जागरूकता लाने को कदम उठाए जाने चाहिए।
जीवन के 85 बसंत देख चुके मुक्तक सम्राट लाखन सिंह भदौरिया सौमित्र कहते हैं कि पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण का ही परिणाम है कि पुत्र मां-बाप के साथ गलत व्यवहार कर रहे हैं। सरकार का यह कानून स्वागत योग्य है, लेकिन लेकिन गिरती नैतिकता पर अंकुश लगाने की दिशा में भी सार्थक पहल होनी चाहिए।
76 वर्षीय दयानारायण गुप्ता दयालू ने कहा कि मां-बाप को असहाय छोड़ने वालों के खिलाफ कानून लागू होना ही चाहिए। बुढ़ापे में माता-पिता की उपेक्षा करने वालों के खिलाफ सजा का प्रावधान नि:संदेह प्रशंसनीय है।
बुजुर्ग जगेंद्र सिंह ने मां-बाप की उपेक्षा करने वाले बेटों के खिलाफ लागू किए जाने वाले कानून की सराहना की है। उन्होंने कहा है कि हो सकता है कि इस कानून के भय से ही बेटे माता-पिता की उपेक्षा करने से बाज आएं। कानून के साथ समाज में भी जागरूकता लाने की जरूरत है।
पूर्व चेयरमैन महेश चंद्र वर्मा ने कहा कि बुढ़ापे का सहारा ही आज उन्हें बेसहारा कर रहे हैं। ऐसे में सरकार को कानून लाना पड़ रहा है। जिस भारत देश में बुजुर्गों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, वहीं अब बच्चे ही बड़े होकर मां-बाप से किनारा कर रहे हैं। कानून से निश्चित रूप से ऐसे मामलों में कमी आएगी।
अधिवक्ता अशोक मिश्र ने कहा कि माता-पिता का भरण पोषण और कल्याण अधिनियम से पुत्रों से उपेक्षित माता-पिताओं को राहत मिलेगी। कानून को सरल बनाना होगा, ताकि आम बुजुर्ग कानून की मदद ले सकें।
सामाजिक कार्यकर्ता गिरजाशंकर चतुर्वेदी उम्र के आखिरी पड़ाव में बेसहारा हो गए हैं। शादी न कर समाज सेवा का संकल्प लेने वाले करीब 88 वर्षीय चतुर्वेदी पिछले एक साल से सड़क पर हैं। नजदीकी रिश्तेदारों ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया है। इन दिनों वह पुरानी तहसील के जीर्ण-शीर्ण बरामदे के नीचे जिंदगी बसर कर रहे हैं। चतुर्वेदी कहते हैं कि उम्र के अंतिम पड़ाव में अब उन्हें किसी से गिला-शिकवा भी नहीं हैं। जिंदगी के चंद दिन यूं ही गुजर जाएंगे।

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