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स्वतंत्रता सेनानियाें के स्मारक उपेक्षित

Mahoba

Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
महोबा। शहीदाें की चिताआें पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पे मरने वालाें का यही बाकी निशां होगा। किसी शायर की यह पंक्तियां अब बेगानी सी लगती हैं। कारण, आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाने वाले स्वतंत्रता सेनानी के स्थलाें पर कहीं कूड़े के ढेर लगे हैं, तो कहीं पर इमारतें बन गई हैं। वहीं, महोबा में आजादी का बिगुल फूंकने वाले स्वतंत्रता सेनानी रज्जब अली आजाद की कब्रगाह से लोगाें ने रास्ता बना लिया है। यहीं पर सूअर और अन्य जानवर घूमते रहते हैं। स्वतंत्रता सेनानियों के स्थलों की देखभाल न किए जाने से ये स्थल बदहाल हैं।
शहर के मोहल्ला चौसियापुरा निवासी रज्जब अली आजाद ने 1942 में महोबा में आजादी का बिगुल फूंका था। वह अपने साथ युवाआें को लेकर निकल पड़े थे। जिन्हें अंग्रेजाें ने काफी यातनाएं दी थीं। इसके बाद भी वह अपने उद्देश्य से नहीं डिगे। लाल बहादुर शास्त्री के साथ जेल में भी रहे। लाल बहादुर शास्त्री ने प्रधानमंत्री बनने के बाद शासन को पत्र लिखकर उनकी पत्नी कदीरन बेगम को पेंशन दिलाई थी और पत्र की एक प्रति महोबा रज्जब अली आजाद के पते पर भेजी थी। जिसका जिक्र उनके भतीजे अल्ताफ हुसैन करते हैं। उनके स्वर्गवास के बाद उनकी कब्रगाह गांधी नगर में बनाई गई। जहां पर अब लोगाें ने रास्ता बनाकर निकलना शुरू कर दिया है। उपेक्षित पड़ी कब्र से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के परिजन खासे आहत हैं।
इसी तरह, चंद्रशेखर आजाद के साथ जेल में रहने वाले स्वतंत्रता सेनानी उमादत्त शुक्ला ने भी महोबा में आजादी का बिगुल फूंका था। उनके स्वर्गवास के बाद उनके परिवार को शासन प्रशासन से कोई मदद नहीं मिली। नतीजतन स्वतंत्रता सेनानी के बेटे मनु शुक्ला अब महोबा छोड़कर मध्य प्रदेश चले गए हैं। स्वतंत्रता सेनानी तीन बार जेल गए थे और जेल से आने के बाद पुन: आजादी की लड़ाई में जुटे रहे।
1857 में स्वतंत्रता संग्राम में क्रूर अंग्रेज जनरल व्हिटलाक ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभा रहे जिला मुख्यालय से 14 किलोमीटर दूर पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के ग्राम ज्योराहा निवासी कल्लू और भवानी समेत आजादी के 16 दीवानाें को हवेली दरवाजा मैदान पर लगे इमली के पेड़ाें पर लटका दिया था। अब इस मैदान पर न तो इमली के पेड़ हैं और न कोई स्मारक। 1996 में जिले के प्रथम जिलाधिकारी उमेश सिन्हा ने हवेली दरवाजा मैदान में शहीदाें का स्मारक बनाए जाने की पहल की थी। लेकिन कुछ दिनाें बाद उनका स्थानांतरण हो गया और आज तक स्मारक नहीं बन सके। अब इस मैदान पर लोगाें ने मकान व अस्थाई दुकानें बनाकर अवैध कब्जे कर लिए हैं। लोगाें को स्मारकाें और शहीदाें के बारे में खासी जानकारी तो है लेकिन कोई इससे प्रेरणा नहीं लेता।
नयापुरा नैकाना निवासी रामशंकर तिवारी (86), चौसियापुरा निवासी अनीस अहमद सिद्दीकी (85) बताते हैं कि 15 अगस्त 1947 को देश आजाद होते ही सुबह पूरे शहर में जश्न का माहौल था। आजादी की खुशी में मसजिदाें में भी तिरंगे झंडे लगा दिए थे। स्वतंत्रता सेनानी रज्जब अली आजाद और उमादत्त शुक्ल के घर बधाई देने वालाें की लंबी लाइनें लगी थीं। सुबह पांच बजे से ही शहर में चहल-पहल और गोले पटाखे चलाए जाने लगे थे। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वासुदेव चौरसिया कहते हैं कि आजादी के दौरान हर समय अंग्रेजाें के अत्याचार का भय बना रहता था। वह कहते हैं कि देश को आजाद कराने में तो बेहद खुशी मिली थी। लेकिन मौजूदा हालातों से वह खासे दु:खी हैं। उनका कहना है कि जिन उद्देश्याें को लेकर लड़ाई लड़ी थी, वह उद्देश्य पूरे होते नजर नहीं आ रहे हैं। देश प्रदेश में भ्रष्टाचार चरम पर है। स्वतंत्रता सेनानियाें को भी काम के लिए लाइन पर लगना पड़ता है। कहते हैं कि युवा सिर्फ अपने आप में मस्त हैं।
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