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150 बीघा जमीन देने वाले कच्ची झोपड़ी में

Mahoba

Updated Fri, 10 Aug 2012 12:00 PM IST
महोबा/बेलाताल। बुंदेलखंड के गांधी की उपाधि से सम्मानित किए गए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मुंशी मंटीलाल का परिवार दो जून की रोटी के लिए मशक्कत कर रहा है। जंग-ए-आजादी के सिपाही की बहू फुटपाथ पर गुड़ बेचकर परिवार चला रही है। आर्थिक स्थिति गड़बड़ा जाने के कारण आजादी के सिपाही के नाती हाईस्कूल तक की शिक्षा ग्रहण नहीं कर सके। अब मजदूरी करके पेट पाल रहे हैं।
17 अक्तूबर 1900 में जैतपुर के कायस्थ परिवार में जन्मे मुंशी मंटीलाल 1932 में कांग्रेस के नेतृत्व में चलाए जा रहे लगान बंदी आंदोलन में मुंशी ने सक्रिय रूप से भाग लिया। इस आंदोलन में मुंशी जी को कठोर कारावास भी हुआ था। अवज्ञा आंदोलन के दौरान संचार सेवा भंग करने के आरोप में उन्हें फिर जेल जाना पड़ा था। भारत छोड़ो आंदोलन में भी मुंशी ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया और अंग्रेजाें की यातनाएं सहीं। कांग्रेस के आह्वान पर विदेशी वस्त्राें के बहिष्कार में 1941 में महात्मा गांधी जी के आह्वान पर किए जा रहे सत्याग्रह के दौरान 1942 के आंदोलन में उनकी अहम भूमिका रही।
150 बीघा जमीन के काश्तकार मुंशी मंटीलाल का परिवार आज दो जून की रोटी के लिए तरस रहा है। आजादी के इस सिपाही ने अपने जीवन काल में राजकीय इंटर कालेज, जिला अस्पताल और खंड विकास कार्यालय के अलावा गरीबाें की एक बस्ती बसाने के लिए जमीन दे दी। जिससे अब उनके परिवार के पास एक बीघा भी जमीन शेष नहीं है। इतना ही नहीं इतने बड़े काश्तकार का परिवार कच्ची झोपड़ी में जीवन बसर कर रहा है। मुंशी मंटीलाल के तीन पौत्र हैं। श्याम बिहारी (28), सुरेश (26) और सुभाष सक्सेना (24)। आर्थिक स्थिति बेहद खराब होने के कारण तीनाें पौत्र कक्षा 8 तक ही शिक्षा ग्रहण कर सके। शिक्षा ग्रहण न कर पाने के कारण अब वह मजदूरी करके परिवार चला रहे हैं। वहीं स्वतंत्रता सेनानी की बहू गायत्री (62) पत्नी परमेश्वरी दयाल सक्सेना बाजार में फुटपाथ पर गुड़ बेचकर गुजारा कर रही है।
15 अगस्त 1972 को स्व. इंदिरा गांधी ने मुंशी को ताम्रपत्र भेंट कर सम्मानित किया था जो आज भी उनके पुत्र के पास मौजूद है। पति के साथ पत्नी ने भी 1939, 1941 और 1942 के सभी स्वतंत्रता आंदोलनाें में भाग लिया। उनकी पत्नी सरस्वती देवी को भी 15 अगस्त 1972 को तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलापति त्रिपाठी ने ताम्रपत्र भेंट किया था। मंटीलाल 20 वर्षों तक ग्राम जैतपुर की ग्राम पंचायत के पदेन प्रमुख रहते हुए अपनी पैतृक भूमि को जैतपुर के विकास के लिए दान में दिया। इतना ही नहीं मुंशी जी को मिलने वाली पेंशन को सहर्ष भारत सरकार के रक्षा कोष में भारत-चीन युद्ध के दौरान दान कर दिया था।
विडंबना यह है कि आजादी के सिपाही मुंशी जी के पुत्र परमेश्वरी दयाल सक्सेना का परिवार न तो शासन से कुछ सहायता पा सका और न ही कोई महत्ता। 5 फरवरी 1980 को मुंशी जी का स्वर्गवास हो गया और 1987 को उनकी पत्नी परलोक सिधार गईं। शासन प्रशासन ने भले ही इस सेनानी के परिवार को भुला दिया लेकिन जैतपुर के विकास के लिए सब कुछ न्योछावर करने वाले सेनानी को यहां के लोग आज भी याद करते हैं।

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शासन ने भी नहीं की कोई आर्थिक मदद
बेलाताल (महोबा)। आर्थिक सहायता के लिए स्वतंत्रता सेनानी के परिवार ने बरसाें शासन स्तर पर भागदौड़ की लेकिन आज तक शासन से इस जंग-ए-आजादी के सिपाही के परिवार को कोई मदद नहीं मिली। जिससे भागदौड़ करते-करते स्वतंत्रता सेनानी का परिवार थककर घर बैठ गया। स्वतंत्रता सेनानी के परिवार को शासन प्रशासन ने भुला दिया।

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पांच एकड़ जमीन गांधी आश्रम को कर दी थी दान
बेलाताल (महोबा)। जैतपुर के बाशिंदाें को गांव स्तर पर रोजगार मुहैया कराए जाने के उद्देश्य से मुंशी मंटीलाल ने गांधी आश्रम के लिए पांच एकड़ जमीन दान कर दी। इस गांधी आश्रम का बना कपड़ा पूरे उत्तर प्रदेश में भेजा जाता है। साथ ही सैकड़ाें श्रमिक यहां पर काम करते थे लेकिन गांधी आश्रम के प्रबंधक की उदासीनता के चलते गांधी आश्रम की स्थिति गड़बड़ा गई जिसके चलते यहां के सैकड़ाें मजदूर बेकार हो गए हैं।

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