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जनपद सृजन के बाद बदला ऐतिहासिक मेले का स्वरूप

Mahoba

Updated Fri, 03 Aug 2012 12:00 PM IST
महोबा। 831 साल पुराने यहां के सुविख्यात कजली महोत्सव को परंपरागत रूप से सिर्फ तीन दिन मनाने का रिवाज महोबा जिला सृजन के बाद बदल गया। प्राचीन परंपरा के अनुसार पहले दिन भादों मास की परीवा को कीरत सागर तट पर तो दूसरे दिन गोखारगिरि पर, तीसरे और अंतिम दिन हवेली दरवाजा पर शहीद मेला लगता चला आ रहा था लेकिन 1995 में नया जिला बनने के बाद इस मेले का समय तीन दिन से बढ़ाकर एक सप्ताह कर दिया गया तभी से यहां कजली मेले को एक सप्ताह मनाए जाने की परंपरा चली आ रही है।
11 फरवरी 1995 को महोबा नया जिला सृजित होने के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी उमेश सिंहा ने इस प्राचीन कजली मेले को और अधिक भव्य स्वरूप देते हुए एक सप्ताह तक मनाए जाने की योजना बनाई थी। तभी से अपने आप में अलग ढंग की लोक कलाओं की छटा बिखेरने वाला कीरत सागर तट का यह मेला प्रदेश ही नहीं पूरे देश में जाना जाने लगा लेकिन इस सफलता का दुखद पहलू यह भी रहा कि वर्ष 1995 के बाद से प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले इस मेले में पहला दिन ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण बनने के साथ प्रमुख दर्जा पा गया। बाद के दो दिन मेले का आकर्षण प्रशासन की पर्याप्त रुचि व व्यवस्थाओं के अभाव में क्षीण होता चला गया। पहले दिन के बाद दो दिनों के मेले ही ऐतिहासिक मूल्यों की नजर से अति महत्वपूर्ण और खास थे। पृथ्वीराज चौहान को हराने के बाद राजा परमाल ने इसके अगले दिन गोखार पहाड़ स्थित भगवान शिव की विशाल तांडव नृत्य करती मूर्ति के साथ समारोह पूर्वक पूजन किया। जीत की खुशी में दूसरे दिन गोखारगिरि पर मेला आयोजित होने लगा। तीसरे दिन हवेली दरवाजे पर लगने वाले शहीदों के मेले की शुरु़आत आजादी की लड़ाई में शहीद हुए 16 देशभक्तों की शहादत को अमर बनाने के इरादों से 1857 के बाद शुरुआत हुई। इसी मैदान पर 16 स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को अंग्रेजों ने इमली के पेड़ में फांसी दे दी थी।
जिला बनने के बाद आयोजक संस्थाओं का पूरा ध्यान इस मेले के पहले दिन को भव्यतम बनाने के लिए ही केंद्रित होकर रह गया। परिणामस्वरूप कजली मेले के शेष बचे दो दिन धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। बाद के दो दिनों में लगने वाले मेले में जहां हजारों जनमानस की भीड़ एकत्र हुआ करती थी और झूलों से सजी दुकानें खरीद फरोख्त का आनंद उठाया करती थी। अब वे अतीत के पन्नों में सिमट कर रह गईं। बीते वर्ष तक आयोजक संस्थाएं केवल एक दंगल का आयोजन कर जैसे तैसे अपने कर्तव्यों का निर्वहन करती चली आ रही हैं।
वर्ष 1995 में जब आयोजक संस्थाओं ने विधिवत घोषणा कर दूसरे और तीसरे दिन के मेले को खत्म कर सारा मेला कीरत सागर तट पर आयोजित करने का फैसला लिया और किसी भी नागरिक के विरोध न करने के कारण यह कीरत सागर तट का ही मेला बनकर रह गया। और न ही इस वर्ष छपे बैनर पोस्टरों में गोखार पहाड़ और हवेली दरवाजा का भी उल्लेख नहीं किया गया।


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