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बच्चाें को बेहतर इंसान बनाने के लिए बदली तस्वीर

Mahoba

Updated Sun, 13 May 2012 12:00 PM IST
महोबा। अदम्य साहस और आत्मविश्वास के साथ जज्बा लेकर कुछ कर गुजरने का हौसला जीने की राह बना देता है। संघर्ष के झंझावाताें के बीच महिला ने परिवार को संवारने और बच्चाें को बेहतर इंसान बनाने के लिए मेहनत, लगन और हौसलाें से घर की तस्वीर बदल दी। अल्प आयु में पिता का साया उठ जाने के बाद असहाय हुए बच्चाें के लिए एक आदर्श मां की प्रतिमूर्ति से कम नहीं है। ऊषा गुप्ता ने बुलंद हौसला दिखाते हुए कहा कि बच्चाें को बेहतर शिक्षा देकर उन्हें संस्कारित करने का प्रयास है। समाज की बुराइयाें से दूर होकर लगन, निष्ठा से अगर कोई कार्य करता है तो सफलता के सोपान उसे मिल ही जाते हैं।
पति की असमय हत्या, बाद में परिवार की कलह से टूटी महिला अपनी कार्य कुशलता के बल पर एक नजीर बन गई। पांचवीं पास होने के बाद भी घरेलू गैस वितरण का कारोबार संभालकर वह अपने बच्चाें की बेहतर परवरिश कर उन्हें एक ऊंचा मुकाम दिलाने के लिए दिनरात पसीना बहा रही है। खरेला कसबा के मोहल्ला हले निवासी ऊषा गुप्ता के पति राकेश गुप्ता बुंदेलखंडी की 9 अप्रैल 2009 को पहरेथा रोड पर स्थित इंडेन गैस एजेंसी में हत्या हो गई थी। ग्रामीण परिवेश में पली बढ़ी और अल्पशिक्षा के साथ घर में कैद रहने वाली महिला ऊषा के लिए यह हादसा पहाड़ टूटने जैसा था। नौनिहाल दो पुत्रियां और दो पुत्राें का जीवन कैसे और किसके सहारे कटेगा यह सोच उसे दिनरात सताने लगी थी। पति के खोने का गम ऊपर से बच्चाें की शिक्षा दीक्षा की झंझटाें में फंसी महिला ही परिवार का सहारा भी बनी। पति के बड़े भाई दिनेश गुप्ता, जो इंजीनियर थे, उनका अपना परिवार सैद्धांतिक मतभेदाें के चलते घर छोड़कर महोबा में बस गया जिससे उसकी परेशानियां और बढ़ र्गइं। फिर भी महिला ने संयम और आत्मविश्वास नहीं छोड़ा। बच्चों की परवरिश का इकलौता सहारा पति द्वारा बनाई गई विरासती इंडेन गैस एजेंसी को चलाने का बीड़ा उठा लिया। जब अपनाें ने दूरी बनाई तो वह नंदोई बद्री गुप्ता का सहारा लेकर गैस एजेंसी चलाने के तौर तरीके सीखने लगी।
मासिक आमदनी के आधार पर रिश्तेदाराें की गैस एजेंसी में काम कर रहे एक मुनीम को तनख्वाह पर रखकर कम समय में ही उसने गैस वितरण के नियम कायदे सीख लिए। पति की मृत्यु के एक वर्ष तक काफी परेशान रहने वाली महिला अब पूरी तरह दक्ष हो गई थी। अब उसे बड़ी पुत्री लक्ष्मी (10), सरस्वती (8), पुत्र कार्तिकेयन (6) और जसवंत (4) की बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए वह दिन रात बस स्टैंड में स्थित शोरूम से लेकर पहरेथा रोड में स्थित इंडेन गैस गोदाम तक का कार्य करने लगी। धीरे-धीरे घरेलू स्थितियां सामान्य होने लगीं। सामाजिक बंधनाें में चहारदीवारी के अंदर रहने वाली घरेलू महिला ने लोकलाज के दायरे में रहकर अपना और काम जिम्मेदारी से करना शुरू कर दिया। अब वह गैस वितरण के कार्य को कंप्यूटर फीडिंग से लेकर अभिलेखीय कार्य को स्वयं निपटाती है।
गैस वितरण का हिसाब किताब बनाने के बाद गोदाम में पहुंचकर गैस का खुद वितरण करती है। उसने अपनी मेहनत और लगन के बल पर अपनी दो पुत्रियाें और एक पुत्र को राठ आवासीय विद्यालय में बेहतर शिक्षा के लिए दाखिला भी करा दिया है।
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