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परिवार का खर्च चलाना भी हो गया दुश्वार

Maharajganj

Updated Wed, 05 Dec 2012 05:30 AM IST
फरेंदा। समाज के सबसे निचले तबके का एक ऐसा वर्ग जिसका न घर है और न ठिकाना। आर्थिक रूप से निर्बल यह वर्ग शिक्षा से वंचित है। परिवार का पालन पोषण के लिए इन लोगों ने मोची का काम चुना। सड़क की पटरी पर बूट पालिश करके यह किसी तरह से अपना और परिवार का पेट पाल रहे हैं। इनके लिए सारी सरकारी योजनाएं बेमतलब है। सरकार की कल्याणकारी योजनाओं की पोल खोलती अशोक पांडेय की रिपोर्ट।
इनसेट
जीविकोपार्जन मुश्किल : सिधवारी निवासी पलटन का कहना है कि वह अशिक्षित हैं। इस व्यवसाय में वह चार वर्षों से हैं। उन पर पांच पुत्रों समेत परिवार की भरण पोषण की जिम्मेदारी है। उसके मुताबिक इस व्यवसाय से जीविकोपार्जन मुश्किल है। सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिलता है।
सरकारी सुविधाएं संपन्न लोगों तक सीमित : शनिचरहिया निवासी बाबूलाल का कहना है कि उनके ऊपर पति, पत्नी और छह बच्चों का दारोमदार है। वे लंबे समय से इस व्यवसाय में हैं। बच्चों की शिक्षा और शादी के लिए सोचना पड़ता है। सरकारी सुविधाएं संपन्न लोगों तक सीमित है।
गुजारा करना कठिन : मथुरानगर निवासी मिठाई लाल के तीन बच्चे हैं। उनका कहना है कि इस धंधे से घर का खर्च चलाना मुश्किल है। सरकार की तरफ से भी कोई सुविधा नहीं मिलती है। ऐसी परिस्थिति में गुजारा करना कठिन है।
तीन लड़कियों की शादी का बोझ : शनिचरहिया के मल्लू का कहना है कि उनके ऊपर तीन लड़कियों की शादी का बोझ है, लेकिन इस व्यवस्था से पारिवारिक ताना बाना टूटता नजर आ रहा है। इससे पेट पालना मुश्किल है।
अनुसूचित जाति का लाभ नहीं : मरचवार निवासी राजाराम का कहना है कि अनुसूचित जाति होने के बाद भी लाभ नहीं मिलता है। सरकार अनुसूचित जातियों को नौकरी समेत अन्य मामले में कई सहूलियत देती है। मगर आज तक किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला।
योजनाएं दूर की कौड़ी : आनंदनगर निवासी मेवालाल का कहना है कि परिवार में पति-पत्नी और चार बच्चों की जिम्मेदारी है। इस उम्र में दूसरा व्यवसाय चलना कठिन है। सरकारी योजनाएं हमारे लिए दूर की कौड़ी हैं।
बूट पालिश का काम फीका : आनंदनगर निवासी प्रेमदास का कहना है कि उन्होंने नौगढ़ डिग्री कॉलेज से बीए की शिक्षा की। पारिवारिक स्थिति में उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया। तीस साल से वह इस धंधे में हैं। आज तक उनका अंत्योदय कार्ड नहीं बना है।
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