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शैक्षणिक संस्थानों की जमीन बिक रही खुलेआम

लखनऊ/ब्यूरो

Updated Sat, 27 Oct 2012 12:43 PM IST
land of academic institutions openly sold
राजधानी में माध्यमिक शिक्षा परिषद के अधीन संचालित सहायता प्राप्त विद्यालय बिल्डरों और भू-माफियाओं की हिट लिस्ट में हैं। शिक्षा के विकास के लिए दान में मिली इन संपत्तियों पर बिल्डर नजरें लगाए बैठे हैं तो प्रबंध तंत्र ने भी उनकी मुरादें पूरी करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। जानकारों की मानें तो बिना प्रबंध तंत्र की संलिप्तता के कोई भी भू-माफिया या बिल्डर इस कारनामे को अंजाम ही नहीं दे सकता।
राजधानी में 108 सरकारी सहायता प्राप्त विद्यालयों का संचालन किया जा रहा है। इनमें से 80 फीसदी विद्यालयों का निर्माण आजादी से पहले या आजादी के बाद 1960 के दशक के बीच किया गया है। ज्यादातर के पास दान की जमीनें हैं। इन भूमियों को शिक्षा के विकास के उद्देश्य के साथ दान किया गया था। इन विद्यालयों का संचालन प्रबंधन कमेटी के माध्यम से किया जाता है। जानकारों की मानें तो यह प्रबंधन समितियां भी सिर्फ नाम मात्र की होती हैं। इनमें अकसर दबंगों की ही चलती है। अगर, प्रबंधक हावी है तो कमान उसके हाथ में होती है। यदि, प्रधानाचार्य मजबूत है तो फिर प्रबंधक की एक भी नहीं चलती। बाकी के सदस्य सिर्फ कोरम पूरा करने के लिए ही रखे जाते हैं।

धड़ल्ले से हुए सौदे
माध्यमिक शिक्षक संघ के प्रदेश मंत्री डॉ. आरपी मिश्र कहते हैं कि 2000 के बाद जमीन की कीमतों में आए अप्रत्याशित उछाल से विद्यालय प्रबंधन तंत्रों की नीयत में खोट आ गई। वहीं, बिल्डर और भू-माफियाओं ने इन विद्यालयों की जमीनों पर नजर गड़ानी शुरू कर दी। 2005 के बाद रातों रात विद्यालयों की जमीनों पर अवैध कब्जे और निर्माण कार्य होने लगे। 2010 तक यानी पांच साल के छोटे से अंतराल में 40 फीसदी से ज्यादा सहायता प्राप्त विद्यालयों की जमीनों का सौदा कर दिया गया।
वह बताते हैं कि इन सभी को लेकर तमाम मामले न्यायालय में अटके पड़े हुए हैं। विद्यालय प्रबंधन और भू माफिया हर साल इन जमीनों पर करोड़ों रुपये का कारोबार कर रहे हैं। उधर, समाज कल्याण के लिए सालों पहले जमीन दान करने वाले आज अपनी जमीनों का हश्र देख कर पछता रहे हैं।

दान की जमीन का हो गया सौदा
तेलीबाग में संचालित सहायता प्राप्त विद्यालय राम भरोसे मैकू लाल स्कूल की स्थापना 1949 में एक प्राइमरी स्कूल के रूप में हुई थी। 1951 में इसे इंटर कॉलेज की मान्यता मिल गई। शुरुआती दौर में विद्यालय के पास करीब 24 एकड़ जमीन थी। यह जमीन आसपास के किसानों ने शिक्षा के उत्थान के उद्देश्य से विद्यालय को दान की थी। समय-समय पर विद्यालय को बिजनौर से लेकर आसपास के क्षेत्र में कई बीघा जमीनें दान में मिली। जानकारों की मानें तो, 2005 के बाद विद्यालय की जमीनों पर तेजी से दुकानों के निर्माण का काम शुरू हो गया। विद्यालय के मुख्य द्वारा से लेकर आसपास की जमीनों पर दुकानें बनने लगी।

वहीं, गांधी नगर में जहां कभी विद्यालय का मैदान हुआ करता था, अब वहां प्लॉट काट कर बेच दिया गया। 2010 तक पहुंचते-पहुंचते विद्यालय की 90 फीसदी से भी अधिक भूमि पर अवैध कब्जे कर लिए गए। वहीं, पूरा विद्यालय 1949 में बने भवन तक ही सिमट कर रह गया है। जानकारों की मानें तो, सालों पहले जहां, विद्यालय का मैदान होता था, वहां अब सप्ताह में दो दिन बाजार लगता है। इन सभी दुकानों से हर माह लाखों रुपये की वसूली की जा रही है। लेकिन, यह पैसा किसके खाते में जा रहा है इसके बारे में कोई जानकारी किसी के भी पास नहीं है। विद्यालय प्रधानाचार्य एसपी सिंह ने बताया कि विद्यालय की देखरेख के लिए उसकी कुछ भूमि को किराये पर दिया गया है। इसकी संपत्ति का ब्यौरा प्रबंधन के पास रहता है। हालांकि, स्थानीय दुकानदारों की मानें तो, दुकानों को यह जमीनें मनमानी कीमतों पर 99 साल की लीज पर दी गई हैं।

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