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तैनाती ललितपुर में, झांसी में निजी प्रैक्टिस

Lalitpur

Updated Sun, 09 Dec 2012 05:30 AM IST
ललितपुर। सरकार भले ही चिकित्सा को सेवा के नजरिए से देखती हो पर सफेद कोट पहनने वाले चिकित्सक सौ फीसदी पेशेवर हो गए हैं। ग्रामीणों को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने के उद्देश्य से जनपद में तैनात किए गए चिकित्सक तैनाती स्थल पर जाने के बजाए अपनी काबिलियत का उपयोग बड़े शहरों के नर्सिंग होम में कर रहे हैं। और तो और आला अधिकारी मेहरबान होकर इनकी मोटी तनख्वाह बेझिझक पास कर देते हैं।
राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के तहत ग्रामीणों को बेहतर से बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से जनपद में करोड़ों रुपये सालाना खर्च किये जाते हैं। सरकार की ओर से धनराशि निर्गत किए जाने के पश्चात इस योजना के बेहतर क्रियान्वयन का दारोमदार चिकित्सकों पर आ जाता है। लेकिन, जनपद में तैनात चिकित्सक योजना को पलीता लगा रहे हैं। मोटी तनख्वाह लेने के बावजूद विभागीय आला अधिकारियों की मिलीभगत से चिकित्सक तैनाती स्थलों पर जाते ही नहीं है। सरकारी अस्पतालों की बजाए वे अपने हुनर का इस्तेमाल निजी अस्पतालों व नर्सिंग होम में कर इसका शुल्क वसूलते हैं। जनपद के स्वास्थ्य विभाग में तैनात एक चिकित्सक को बीते दिनों विभागीय खर्च पर एनेस्थेटिक्स का प्रशिक्षण दिया गया, पर वे झांसी के कई नर्सिंग होम में अपनी काबिलियत का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनकी झांसी में बहुत डिमाइंड है। मड़ावरा ब्लाक के एक अस्पताल में तैनात चिकित्सक मऊरानीपुर में बड़ा अस्पताल संचालित कर रहे हैं। मजेदार बात यह है कि तैनाती स्थल के रजिस्टर पर उनके हस्ताक्षर भी अंकित रहते हैं। एक ही समय में दोनों स्थानों पर चिकित्सक कैसे पहुंचते हैं, यह जांच का विषय है। यही नहीं अति पिछड़े व गरीब क्षेत्र मड़ावरा के एक सरकारी अस्पताल में तैनात चिकित्सक कई महीनों से बिना बताए गायब थे। तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी बीएल मोठवानी ने उनका वेतन रोक दिया था। कार्य में लापरवाही के बावजूद कुछ दिनों पहले उक्त चिकित्सक का वेतन निर्गत कर दिया गया।

प्रशासन को किया गुमराह
ललितपुर। चिकित्सकों को बचाने के लिए विभागीय आला अधिकारी किसी भी हद तक चले जाते हैं। बीते दिनों जिलाधिकारी की अध्यक्षता में आयोजित एक बैठक के दौरान जनपद में एनेस्थेटिक्स की तैनाती न होने की जानकारी प्रशासन को दी गई, जबकि सरकारी खर्च पर एक चिकित्सक को एनेस्थेटिक्स का प्रशिक्षण इस कमी को दूर करने के लिए दिया गया था। इससे साफ हो गया कि तैनाती स्थल पर नहीं पहुंचने वाले डाक्टरों की करतूतों पर परदा डालने के लिए विभागीय अधिकारी प्रशासन को गुमराह करने से भी बाज नहीं आते।
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