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गांवों में नहीं फूटी विकास की किरण

Lalitpur

Updated Sun, 30 Sep 2012 12:00 PM IST
ललितपुर। आधुनिकता के दौर में बिजली व सड़क के बिना जिंदगी की कल्पना संभव ही नहीं है। बावजूद इसके जनपद के वन क्षेत्रों के आसपास दशकों से बसे गांव के लोग बिना बिजली व सड़क के जिंदगी का एक - एक दिन गुजार रहे हैं। यहां सूर्योदय से शुरू होने वाली दिनचर्या सूर्यास्त पर समाप्त हो जाती है। टीवी, फ्रिज, बल्ब आदि उपकरण ग्रामीण जानते ही नहीं। मुख्यमंत्री के आगमन पर विकास की उम्मीद लगाए यहां के लोगों को फिलहाल निराशा ही हाथ लगी है।
भारत गांवों में बसता है और हर सरकार ग्रामीण इलाकों के विकास को कटिबद्ध रहती है। बावजूद इसके मड़ावरा ब्लाक स्थित लखंजर, पापड़ा, कुर्रट, वनगुआं, बारई, हीरापुर, धौरीसागर, सकरा, सौलदा, गौठरा, उल्दना व जैतूपुरा सहित कई गांवों में न तो सड़क है और न बिजली। जंगलों के बीच से होकर गुजरते दुर्गम पठारी रास्तों से होकर गांव जाना पड़ता है। कई गांवों में तो वाहन से पहुंचना असंभव है। प्रशासनिक अधिकारी भी अपने वाहन दूर खड़े करके गांव तक पहुंचते हैं। गांव में बिजली नहीं है। ग्रामीणों की पीढ़ियां रात में जगमगाते बल्ब की रोशनी देखे बिना परलोक सिधार गईं। जहां नगरीय इलाकों में इंटरनेट का इस्तेमाल करके लोग घर बैठे देश दुनिया से जुड़े रहते हैं, वहीं इन गांवों में रहने वाले ग्रामीणों को पड़ोस के गांव में होने वाली गतिविधियां कई दिनों बाद मालूम चलती हैं। बीते कुछ वर्षों के दौरान संचार संसाधनों में देश ने भले ही लंबी छलांग लगा ली हो, पर इन गांवों में रहने वाले ग्रामीणों के लिए ऐसी उपलब्धियों के कोई मायने नहीं हैं। शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाएं भी ग्रामीणों को समय से नहीं मिल पातीं। इसकी वजह से बच्चों को कुपोषण की त्रासदी से भी गुजरना पड़ता है। इलाज के अभाव में भी तमाम लोग दम तोड़ देते हैं।
बिजली व सड़क बिना ठहर गए इन गांवों के विकास को लेकर लोग मुख्यमंत्री की ओर टकटकी लगाकर देख रहे थे। उम्मीद थी कि वे कोई रास्ता जरूर निकालेंगे, पर ऐसा कुछ नहीं हो सका।


नहीं होती शादी
ललितपुर। कुर्रट गांव में पानी की समस्या का निदान वर्षों से नहीं किया गया। पहाड़ी इलाका होने के कारण हैंडपंप असफल हो जाते हैं। ऐसे में महिलाओं को कई किलोमीटर दूर स्थित पहाड़ी नदी से प्रतिदिन पानी भरना पड़ता है। यह समस्या प्रचारित हो गई और दूसरे गांव के लोगों ने अपनी लड़कियों का संबंध यहां करना बंद कर दिया। इस कारण तमाम ग्रामीण कुवांरे ही परलोक सिधार चुके हैं और शादी बिना दर्जनों पचास की उम्र पार कर चुके हैं।
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