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अपनों की दी चोटों ने ली बुजुर्ग गैंडे बांके की जान

महबूब आलम पलियाकलां।

Updated Thu, 01 Dec 2016 11:44 PM IST
The injuries claimed the lives of elderly loved ones rhino Banke

गैंडाPC: अमर उजाला

- दुधवा नेशनल पार्क में बांके से ही हुई गैंडा परिवार में वंशवृद्धि की शुरूआत
- वर्ष 1984 में परियोजना शुरू करने को असम के पावितारा वन्यजीव बिहार से लाया गया था बांके
महबूब आलम पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क के सबसे बुजुर्ग और दुधवा में गैंडा परिवार के जनक बांके की जान उसके अपनों द्वारा दी गई चोटों ने ही ले ली। सोनारीपुर रेंज में करीब 32 साल पहले बसे गैंडा परिवार में अब बूढ़े हो चले बांके की चहल कदमी उसके वंशज युवा नर गैंडों को नहीं भा रही थी। उन्होंने आए दिन उसे जख्म देने शुरू कर दिए और बुधवार को उसने दम ही तोड़ दिया।
विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडे को तकरीबन 32 साल पहले वर्ष 1984 में दुधवा नेशनल पार्क के सोनारीपुर रेंज में पुनर्वासित किया गया था। भारत सरकार ने सबसे पहले आसोम के पावितारा वन्यजीव विहार से दो नर और तीन मादा गैंडे लाकर यहां गैंडा पुनर्वास परियोजना शुरू की थी जो नर गैंडे दुधवा लाए गए, उसमें से एक बांके था। उस समय बांके 16 साल का जवान था। दुधवा नेशनल पार्क के इस समय गैंडा परिवार में चार पीढ़ियां पल रही है। इनमें से अधिकांश गैंडे बांके की ही संतान हैं। बांके ने दुधवा में गैंडा परिवार की वंश वृद्धि की। अब यहां गैंडा परिवार बढ़कर करीब करीब 34 तक पहुंच गया। 

गैंडा परियोजना का नायक माना जाता था बांके
बांके को गैंडा पुनर्वास परियोजना का नायक माना जाता था। बताया जाता है कि बांके ही एक ऐसा गैंडा था जो परियोजना में खुलकर सैलानियों के सामने आता था, जबकि अन्य गैंडे सैलानियों के सामने आने से कतराते हैं। डीडी महावीर कौजलगि बताते हैं कि बांके अन्य गैंडों की अपेक्षा खुलकर सामने आता था।

बांके के नाम से होगा एक मेमोरियल हाल
दुधवा की सोनारीपुर रेंज में सलूकापुर में चल रही गैंडा पुनर्वास परियोजना के पितामाह बांके की याद में एक मेमोरियल हाल को उसका नाम दिया जाएगा। डीडी से ने बताया कि इसके लिए राय शुमारी चल रही कि यह हाल कहां होगा।

राइनो एरिया होगा अब बांके राइनो एरिया
राइनो एरिया को अब बांके राईनो एरिया के नाम से जाना जाएगा। इसकी तैयारियां की जा रही हैं। डीडी ने बताया कि राइनो एरिया का नाम अब बांके राइनो एरिया कर दिया जाएगा। बता दें कि दुधवा में एक ताल को पूर्व से ही बांके ताल कहा जाता है।

स्वाभाविक तौर से हुुई थी बांके की मौत
पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क की सोनारीपुर रेंज गैंडा परियोजना में मृत पाए गए गैंडा बांके की मौत स्वाभाविक हुई थी, हालांकि उसके कुछ चोट के निशान हैं जो अन्य नर गैंडों के हमलों के बताए जा रहे हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इसका खुलासा हुआ है। उसकी विसरा प्रिजर्व कर लिया गया है जिसको आईवीआरआई बरेली भेजा जाएगा।
चिकित्सक डॉ. जेबी सिंह, डॉ. सौरभ सिंघई और नेहा सिंघई के तीन सदस्यीय चिकित्सकीय पैनल ने बुधवार को मृत मिले गैंडा बांके का पोस्टमार्टम किया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक गैंडे की मौत उम्र के तकाजे से स्वाभाविक हुई है, हालांकि उसके कुछ चोट के निशान मिले हैं जो कई दिनों के हैं। माना जा रहा है कि दूसरे नर गैंडों ने क्षेत्र रक्षण के लिए उससे संघर्ष किया होगा। डिप्टी डायरेक्टर महावीर कौजलगि ने बताया कि पोस्टमार्टम हो चुका है और स्वाभाविक मौत सामने आई है। उसके विसरे को प्रिजर्व कर लिया गया है। जिसे आईवीआरआई बरेली भेजा जाएगा। इस दौरान दुधवा में एफडी सुनील चौधरी भी मौजूद रहे।

द्वितीय चरण में अन्य गैंडों की पहचान देने की कवायद शुरू
पलियाकलां। दुधवा नेशनल पार्क की गैंडा परियोजना के गैंडा सदस्यों को उनकी पहचान देने का अब द्वितीय चरण शुरू हो चुका है। पहले चरण में करीब 25 गैंडों को उनकी पहचान दी जा चुकी है। इससे गैंडों के रखरखाव में काफी दुश्वारियां दूर हुईं हैं।
गौरतलब है कि तकरीबन चार पांच साल पहले दुधवा की गैंडा परियोजना में गैंडों को उनकी पहचान देने के लिए आईडी जनरेट करने का कार्य शुरू हुआ था। पहले चरण में करीब 25 गैंडों की आईडी जनरेट हुई थी और इसके तहत बुकलेट बनी थी, जिसमें हर गैंडे की अलग पहचान और नाम शामिल थे। इसके बाद भी तमाम गैंडे आईडी से वंचित रह गए थे, जिनको पहचान देने के लिए दुधवा में द्वितीय चरण भी शुरू हो गया है। इस द्वितीय चरण में आईडी जनरेट की जा रही है। सभी गैंडों की आईडी जनरेट हो जाएगी तो उनकी तादाद भी आसानी से जानी जा सकेगी। अधिकारियों के मुताबिक अभी तक गैंडों की जो तादाद रिकार्ड में थी, वह करीब 34 हैं, लेकिन गैंडे इससे ज्यादा हैं। इसके बाद ही सही संख्या सामने आ सकेगी।
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