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घाघरा व शारदा ने मिटा दिया दर्जनों गांवों का वजूद

Lakhimpur

Updated Tue, 07 Aug 2012 12:00 PM IST
अब तो सड़क किनारे जिंदगी बिताना बनी इनकी नियति
ईसानगर-खीरी। जनप्रतिनिधियों व सरकारी मशीनरी की उदासीनता के चलते कई गांव राजस्व मानचित्र से गायब हो चुके हैं। इन गांवों के बारे में जब तक प्रशासन चेता सब कुछ खत्म हो चुका था। अब बारी भदईपुरवा की है जहां हालात अन्य प्रभावित गांवों से अलग नहीं हैं लेकिन अभी तक प्रशासनिक मशीनरी के न चेतने के कारण स्थिति और गांवों की तरह होने का डर सता रहा है।
ग्राम भदई पुरवा निवासी बलमोहन वर्मा की 25 बीघा जमीन काटने के बाद एक एकड़ में बने उनके पक्के दो मंजिला मकान को जमींदोज कर चुकी घाघरा की उफनती लहरों को सूनी आंखों से देखते हुए कहते हैं कि अब मात्र 12 बीघा जमीन बची है। कटान जारी रहा तो बचने की उम्मीद कम ही है। अपने रिश्तेदार के मकान में ग्राम अख्तियारपुर में श्री वर्मा शरण लिये हुए हैं।
गांव के ही निवासी मुंशीलाल गुप्ता का भी दर्द कुछ कम नहीं है एक कच्चे और एक पक्के मकान के मालिक थे। गांव में छोटी सी दुकान चलाकर गुजर बसर कर लेते थे लेकिन नदी की तबाही ने इन्हें भी बेघर कर दिया। नदी में गिरने से बचे सामान के साथ ईसानगर-कटौली मार्ग के किनारे डेरा डाल लिया है। बताते हैं कि सरकार की तरफ से अभी तक कुछ नहीं मिला है।
भदईपुरवा के 70 वर्षीय अब्दुल मजीद आंखों पर मोटे शीशे का चश्मा लगाये अपने पक्के घर का मलबा बटोरते डबडबाई आंखों से कहते हैं कि पिछले साल बचाव कार्य किया गया था तो कुछ रोकथाम हो गयी थी लेकिन इस साल कोई झांकने तक नहीं आया है। अब तो ऊपर वाले का ही सहारा है।
मुन्ना अंसारी का कच्चा मकान गांव के बीच में था लेकिन नदी ने अब अपने बीच में कर लिया है। बड़ी मायूसी से कहते हैं कि मेहनत मजदूरी का ही सहारा है। जमीन थी वह पहले ही नदी में चली गयी थी। अब तो सिर छिपाने की जगह भी नहीं बची है। सरकारी तंत्र से मायूसी जाहिर करते हुए कहते है कि सहायता के नाम पर गांव वालों को मीठे बोल तक नसीब नहीं हुए।
भदईपुरवा की स्थिति को देखते हुये कहा जा सकता है कि मानवीय संवेदनाओं से शून्य हो चुके स्थानीय प्रशासन ने किसी प्रकार की तैयारी नहीं की थी। यदि पिछले साल से प्रशासन सबक लेता तो गांव व गांव वालों की स्थिति इतनी दयनीय नहीं होती।
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