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वीरान हुआ भदईपुरवा

Lakhimpur

Updated Mon, 06 Aug 2012 12:00 PM IST
खुद अपने हाथ तोड़ रहे अपने ‘सपनों’ का महल
लखीमपुर/ईसानगर। धौरहरा तहसील क्षेत्र के कभी खुशहाल गांवों में गिने जाने वाला भदईपुरवा गांव वीरान होने के कगार पर है। करीब चार दिनों से इस गांव में रहने वाले करीब 150 परिवारों के चेहरे से मुस्कान गायब हो चुकी है। इस गांव में बच्चों की खिलखिलाहट के बजाय हथौड़ों की चोट व महिलाओं की चीत्कार ही सुनाई दे रही है। कटान पीड़ित हर शख्स के चेहरे पर भविष्य की चिंता की लकीरें साफ झलक रहीं हैं।
गांव निवासी शिवचंदर लाल भी अपने भाग्य को कोस रहे है। गांव में अच्छा खासा मकान था। परिवार के सभी लोग खुशहाली में जिंदगी गुजार रहे थे। घाघरा ने उसके मकान को अपने आगोश में क्या लिया मानों उसका सब कुछ नदी में समा गया हो। ऐसा हो भी क्यों न शिवचंदर ने अब तक हाड़तोड़ मेहनत से जो कुछ कमाकर घर बनाया वह पलक झपकते नदी में समा गया। कभी आलीशान मकान में रहने वाला उसका परिवार सड़क किनारे पॉलीथिन के सहारे बनाई झोपड़ी में रहने को मजबूर है।
गांव के संपन्न किसान कहे जाने वाले मुन्नू लाल वर्मा का पूरे पांच कमरों व कई बरामदों वाला आलीशान मकान था। नदी जब उसके मकान को लीलने लगी तो पहले तो मुन्नूलाल परिजनों के साथ हथौड़ा लेकर उसे तोड़ने में जुटा, लेकिन देखा कि देरी हुई तो मलबा भी नहीं मिल सकेगा इसलिए किराए की जेसीबी मशीन मंगवा ली।
गांव निवासी मो. रिजवान, कलाम, उस्मान व अब्दुल खालिक डबडबाई आंखों से अपने मकान का सामान लादकर एक अंजान मंजिल की ओर जाने की बात कहते हुए रो पड़ते हैं। कहते हैं कि आज तक तमाम लोग एक साथ एक परिवार की तरह गांव में रहते थे, अब नदी की तबाही ने सबको अलग कर दिया है। जिसका जिधर मुंह उठा उधर ही चला जा रहा है।
अनीस अपने जिन दो भाइयों सुफियान व नसीम के साथ जिस मकान में रहते थे वह आज डूब रहा था। उनके घर के बाहर बड़ा सहन था। पाकड़ का छायादार पेड़ भी। अब वहां नदी की तेज धार बह रही है। इन लोगों ने मिर्जापुर गांव में अपने जानने वालों के यहां बचा खुचा सामान डाल दिया है। सरकारी मदद का इंतजार है, लेकिन अहेतुक सहायता अभी तक न पाने वाले ग्रामीण अपने बचे सामान को किसी तरह सुरक्षित स्थाना तक ले जा रहे हैं।
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