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एनआरआई निभा रहा पिता का फर्ज

Lakhimpur

Updated Sun, 17 Jun 2012 12:00 PM IST
पड़रिया के अंधे दंपति के परिवार की उठाई जिम्मेदारी
बेटी की शादी से लेकर घर बनाने के लिए की मदद
आंखों के इलाज के लिए खर्च उठाने को हुए तैयार
बिजुआ (लखीमपुर-खीरी)। ऐसा नहीं कि जन्म देने वाला ही पिता होता है, एक परिवार को पालना उसकी जिम्मेदारी निभाना भी पिता के फर्ज से कम नहीं। सात समंदर पार रह रहा देश का लाल माटी का कर्ज अदा करने में लगा है, पड़रिया तुला में मुफलिसी में जी रहे अंधे दंपति एवं उसकी बेटी के लिए यह एनआरआई एक पिता का फर्ज पूरा कर रहा है। घर के खर्च से लेकर घर बनाने तक में दूर देश में बैठे उस लाल ने पूरी जिम्मेदारी उठाई है। इस अंधे दंपति की बेटी की शादी में वह खुद न आ सका, लेकिन उसकी भेजी हुई मदद से इस गरीब बिटिया के हाथ पीले हो गए।
न कोई रिश्ता, न कोई बंधन, न जाने कैसे इस परिवार को एक पिता के समान इंसान मिल गया। जिसे अपने परिवार से न कोई जमीन जायदाद का लालच है और न ही कुल खानदान के नाम का, महज इंसानियत के रिश्ते से उस शख्स ने मिसाल पेश की है। कहते हैं कि खून के रिश्ते गहरे होते हैं, लेकिन यहां एक परिवार का दर्द देखकर दूर देश में बसे भारत देश के लाल ने एक ऐसा रिश्ता कायम किया जिसकी मिसाल देखते बनती है।
पड़रिया तुला गांव के बालगोविंद की उम्र 55 साल होगी, बचपन में चेचक निकलने से इनकी आंखों की रोशनी चली गई, कुछ सालों बाद मां-बाप का साथ छूट गया। शादी लायक हुए तो इनकी शादी जन्मांध चंद्रवती से हो गई। अब अंधे दंपति ही एक-दूसरे का सहारा बन गए। कई सालों के बाद भगवान ने इन्हें एक बेटी दी, नाम रखा सत्यवती। नन्हीं सत्यवती होश संभालते ही अपने मां-बाप का सहारा बन गई। अपने मां-बाप के लिए कलयुग के श्रवण की भूमिका निभा रही सत्यवती पर जब अखबार ने दास्तां छापी, तो सात समंदर पार कुवैत में बैठे देश के लाल इंद्रजीत सिंह गिल इस दर्द को देखकर मदद को आगे आए।
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इंसेट
दो हजार प्रति माह, साथ में घर बनाने को दी इमदाद
इंद्रजीत सिंह दिल्ली के रहने वाले हैं, लगभग तीन दशक पूर्व वह बिजनेस के सिलसिले में कुवैत गए थे, वहां सफात शहर में अपना आशियाना बसा लिया। इंद्रजीत सिंह एक बेटी के फर्ज और त्याग की कहानी सुनकर इस परिवार के दर्द के साथ जुड़ गए। सबसे पहले उन्होंने एक हजार रुपये की चेक भेज कर इस परिवार की मदद करने की इच्छा जाहिर की, उन्होंने एक खत भी भेजा साथ में अपना फोन नंबर देकर बात करने की अपील की। इंद्रजीत सिंह ने बालगोविंद को फोन कर हालात जाने, उसके बाद मदद का सिलसिला शुरू हो गया। जैसे एक पिता अपने परिवार की जिम्मेदारी निभाता है, ठीक वैसे ही इस परिवार को हर माह दो हजार रुपये की मदद ड्राफ्ट से आ जाती है, इंद्रजीत सिंह ने इन्हें घर बनाने के लिए मदद की है।
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कच्ची कोठरी में बसर करता था ये परिवार
बालगोविंद के पास दो बीघा जमीन थी, जिसे ठेके पर देने से उन्हें खाने को गल्ला मिल जाता था, लेकिन इतना पैसा नहीं था कि पक्कीछत की ख्वाहिश पूरी हो पाती, लेकिन एक मददगार ने इस परिवार के लिए पिता की जिम्मेदारी निभाकर इस परिवार को पक्की छत दी है।
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इसी मदद से बेटी के हाथ हुए पीले
इंद्रजीत सिंह का इस परिवार से भले कोई रिश्ता न हो, लेकिन उनकी मदद से इस बेटी के हाथ पीले हुए हैं। सत्यवती के पिता के पास इतनी जरिया नही थी, कि बेटी की शादी धूमधाम से कर पाते, लेकिन इस परिवार के मददगार के चलते सत्यवती के हाथ पीले हो गए। अब सत्यवती अपने पति सर्वेश के साथ अपने माता पिता की सेवा करने में जुटी है।
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कहा, आंखों का इलाज कराएंगे हम
एक रोज बालगोविंद के पास उस पिता रूपी शख्स ने कुवैत से फोनकर उनकी आंखों की बीमारी की जानकारी ली, जब गिल को पता चला कि वह चेचक की बीमारी से अंधे हुए हैं, तो उन्हाेंने कहा कि कहीं बड़े अस्पताल में अपनी आंखें चेक कराओ, अगर डाक्टर कुछ रोशनी की गुंजाइश कहे, तो बताना मैं दुनिया के बड़े से बड़े डाक्टर से आपकी आंखों का इलाज कराऊंगा। इस उम्मीद में बालगोविंद सीतापुर आंख अस्पताल तक गए लेकिन डाक्टरों ने कहा कि अब रोशनी की कोई गुंजाइश नहीं है।
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