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चीनी मिलों का विकल्प बन रहे क्रशर

Kushinagar

Updated Tue, 11 Dec 2012 05:30 AM IST
पडरौना। चीनी मिलों की बदहाली के चलते कुशीनगर में क्रशर उद्योग तेजी से विकसित हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक जिले भर में 700 क्रशर चल रहे हैं। ये डेढ़ करोड़ क्विंटल गन्ने की पेराई कर रहे हैं।
कुशीनगर जनपद में पिछले साल 81 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में गन्ने की बुवाई हुई थी। गन्ना विभाग के मुताबिक जनपद में औसत पैदावार 525 कुंतल प्रति हेक्टेयर की है जबकि जो छह चीनी मिलें चल रही हैं, उन्होंने कुल मिलाकर 253 लाख कुंतल गन्ने की ही पेराई की। कुल पैदावार का 10-12 प्रतिशत गन्ना बीज के रूप में प्रयुक्त हो जाता है। डेढ़ करोड़ क्विंटल गन्ना क्रशरों पर ही जा रहा है। चीनी मिलों की बदहाली और भुगतान की खराब स्थित के चलते किसान क्रशरों पर सरकारी रेट से कम दर पर भी गन्ना सहर्ष बेचने को तैयार है। वजह यह कि नवंबर में ही चालू होने वाले क्रशर एक तो किसान को तत्काल भुगतान देते हैं दूसरे वहां न तो पर्ची का झमेला है न ही कोई और तामझाम। किसान अपनी जरूरत और फुर्सत के हिसाब से गन्ने की छिलाई करके इन क्रशरों पर सप्लाई कर देते हैं। यही वजह है कि आज जनपद में सुकरौली बाजार, बतरौली बाजार, सिधुआं स्थान, बसहिया, खिरकिया, डोमनपट्टी सरीखे एक दर्जन स्थान ऐसे हैं, जहां प्रत्येक जगह पर 50 से ज्यादा बड़े क्रशर काम कर रहे हैं। सुबह चार बजे से ही इन जगहों पर गन्ना काश्तकार ट्रेलर व बैलगाड़ी पर गन्ना लिए पहुंचते हैं और सुबह के नौ बजे तक गाड़ी खाली कराकर वापस अपने घर भी चले जाते हैं। नवंबर से फरवरी तक के चार महीने इन जगहों पर 24 घंटे काम चलता रहता है। यहां यह बता दें कि जनपद में कुल 10 चीनी मिलें हैं, जिनमें से छितौनी, रामकोला खेतान, लक्ष्मीगंज और कठकुईयां बंद हैं जबकि पडरौना चीनी मिल चल तो रही है लेकिन केवल नाम की। इस साल भी जनपद में 92 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में गन्ना बोया गया है। पडरौना चीनी मिल चली ही नहीं और बाकी ने अभी पेराई सत्र शुरू किया है जबकि क्रशरों पर पिछले डेढ़ महीने से लंबी कतारें लगी हैं। उत्तर प्रदेश गन्ना शोध संस्थान के उप निदेशक ओमप्रकाश गुप्ता भी मानते हैं कि क्रशर कुशीनगर में चीनी मिलों का विकल्प बनते जा रहे हैं।
एक क्रशर पर 15 लोगों को रोजगार
पडरौना। क्रशर उद्योग ने रोजगार का अवसर उपलब्ध कराया है। एक क्रशर प्लांट पर 12 से 15 लोगों को रोजगार मिल रहा है। जबकि क्रशर स्थापित करने में मात्र चार लाख रुपए का खर्च आता है।
क्रशर के कारोबार से जुड़े लोग बताते हैं तीन लाख रुपए की मशीन लगती है। एक बड़ा प्लांट लगाने में न्यूनतम 12 कट्ठा जमीन लगता है। काम शुरू होने पर दो लोग प्रतिदिन गन्ना खरीद का काम करते हैं। एक मजदूर मशीन में गन्ना लगाने के लिए और दो लोग गन्ना ढोने के लिए लग जाते हैं। इसके अलावा रस पकाने और गुड़ बनाने में बाकी लोग काम करते हैं। एक बड़े प्लांट पर सामान्यतया 70 से 80 क्विंटल गन्ना प्रतिदिन पेरा जाता है। नवंबर में क्रशर चालू हो जाते हैं और फरवरी के अंत में बंद होते हैं। जिन क्षेत्रों में क्रशर चल रहे हैं, उन इलाकों में मजदूरों के लिए काम का संकट नहीं है। कारोबारी बताते हैं कि अब तो बिहार से भी यहां मजदूर आने लगे हैं।
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