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न बकाया मिला न चीनी मिलें चलीं

Kushinagar

Updated Wed, 21 Nov 2012 12:00 PM IST
पडरौना (कुशीनगर)। सूबे में सर्वाधिक चीनी परता और पूर्वी उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक गन्ना पैदा करने वाले कुशीनगर जनपद के किसानों की दुश्वारियां कम नहीं हो रही हैं। मिलाें पर बाकी करोड़ों रुपये अब तक नहीं मिले। इस साल न तो अभी तक गन्ने का सरकारी मूल्य घोषित हुआ और न ही चीनी मिलें चालू हुईं।
किसानों की उम्मीदें गन्ने पर ही टिकी हैं। पूर्व विधायक पुरुषोत्तम कौशिक गन्ने की फसल को कुशीनगर के किसानों की लाइफ लाइन कहते थे। दो दशक से हर साल गन्ना किसानों की समस्याओं को लेकर चीनी मिलों पर आंदोलन होते रहे हैं, लेकिन दिक्कतें कम नहीं हुईं। जिला बनने के वक्त नौ चीनी मिलें यहां थीं। उनमें से निगम क्षेत्र की छितौनी, रामकोला खेतान और लक्ष्मीगंज तथा कठकुइयां चीनी मिल बंद होकर कबाड़ हो गईं। पडरौना चीनी मिल एक दशक की बंदी के बाद चालू तो हो गई, लेकिन इसकी दशा बंद मिलों जैसी ही है। इस चीनी मिल पर पहले के 12 करोड़ और पिछले सत्र के भी करीब चार करोड़ रुपये बाकी हैं। कई अन्य चीनी मिलों पर अंतर मूल्य भुगतान के मद के भी दस करोड़ रुपये बाकी हैं। डुमरी निवासी श्याममुरली मनोहर मिश्र के डेढ़ लाख रुपये पडरौना चीनी मिल पर बकाया है। खेसिया के संजय मल्ल के भी सवा लाख रुपये से ज्यादा बाकी हैं। चिरगोड़ा निवासी बुंदल पांडेय के भी 1.80 लाख रुपये बाकी हैं। आधारपट्टी के विश्वनाथ गुप्ता और दीनानाथ का भी बकाया आज तक नहीं मिला। इन काश्तकारों ने रकम की उम्मीद में बैंक से कर्ज लिए थे, जिस पर बैंकों ने 11 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज वसूला।
गन्ना किसानों की समस्याओं को लेकर 1992 में रामकोला में और 2000 में पडरौना में किसानों ने बड़े आंदोलन किए। हुकूमत ने उनकी समस्या सुलझाने के बजाय दमन का रास्ता अख्तियार किया। पुलिस फायरिंग में रामकोला में किसान पड़ोही हरिजन और जमादार मियां तथा पडरौना में एक बालक भुल्लन की मौत हो गई थी। तब पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ सिंह, चंद्रशेखर, भाकियू के महेंद्र सिंह टिकैत समेत तकरीबन हर दल के राष्ट्रीय नेता आए थे। लगा कि किसानों की समस्याएं खत्म हो जाएंगी, लेकिन इन तीनों की शहादत भी काम नहीं आई।
इस बार अधिक गन्ना पैदा करके किसान मुसीबत में पड़ गए हैँ। पिछले साल की तुलना में इस वर्ष जनपद का गन्ना क्षेत्रफल 11000 हेक्टेयर से बढ़कर 92000 हेक्टेयर हो गया है। गन्ना शोध संस्थान गोरखपुर के उप निदेशक ओमप्रकाश गुप्ता के मुताबिक जनपद में करीब 20 प्रतिशत गन्ना अगैती प्रजाति का है, जो नवंबर में तैयार हो जाता है। जनपद में प्रति हेक्टेयर उपज 527 कुंटल है। इस हिसाब से बोए गए गन्ने की औसत उपज निकाली जाए तो यह 48 करोड़ 48 लाख 40हजार कुंटल होगी। इतना गन्ना पेरने के लिए जिले की छह मिलों में से एक भी चालू नहीं हो पाईं। सरकार ने गन्ने का सरकारी रेट तक घोषित नहीं किया है। मजबूरन किसान औने-पौने दाम पर गन्ना क्रशर मालिकों को बेच रहे हैं। किसानों की इस दुश्वारी पर राजनैतिक दलों ने भी चुप्पी साध रखी है।
रणनीति बनाएंगे: लल्लन
भाजपा के जिलाध्यक्ष लल्लन मिश्र का कहना है कि अभी तक वे लोग संगठन के चुनाव में व्यस्त थे, अब गन्ना किसानों की समस्याओं के लिए आंदोलन की रणनीति बनाएंगे। जिलाध्यक्ष के मुताबिक वे लोग गन्ना मूल्य 400 रुपये प्रति कुंटल देने और चीनी मिलें शीघ्र चालू कराने की मांग करेंगे।
जल्दी आंदोलन करेंगे: राजेंद्र
कांग्रेस के जिलाध्यक्ष राजेंद्र पांडेय का कहना है कि प्रदेश सरकार की वजह से ही किसानों को दिक्कत का सामना करना पड़ रहा है। कांग्रेस ने आंदोलन की रणनीति बना ली है। एकाध दिन में प्रदेश पर्यवेक्षक आने वाले हैं। बैठक कर आंदोलन की तारीख तय की जाएगी। जिलाध्यक्ष के मुताबिक 20 से 25 नवंबर के बीच वे लोग आंदोलन कर सकते हैं।
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