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एक दशक में बरामद गोवंशों का पता नहीं

Kushinagar

Updated Wed, 24 Oct 2012 12:00 PM IST
खड्डा। पिछले एक दशक के दौरान खड्डा और नेबुआ नौरंगिया पुलिस ने करीब एक हजार गोवंश बरामद तो किया लेकिन उनका अब कहीं अता-पता नहीं है। जिन मामलों में फाइनल रिपोर्ट लग गयी है उनमें भी जानवरों की नीलामी प्रक्रिया नहीं अपनायी गयी। इस एक दशक के दौरान एक भी गोवंश का पोस्टमार्टम तक नहीं हुआ। खुद पुलिस भी यह बता पाने की स्थिति में नहीं है कि जिन लोगों को ये बेजुबान सुपुर्द किए गए थे उनके पास आज ये पशु हैं भी या नहीं।
उल्लेखनीय है कि तस्करी के जरिए ले जाए जा रहे गोवंश को जब पुलिस पकड़ती है तो गोवध निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज करने के बाद इन जानवरों को माल मुकदमाती मानकर किसी न किसी व्यक्ति की सुपुर्दगी में दे दिया जाता है। इस सुुपुदर्गी का बाकायदा पुलिस रिकार्ड बनता है। नियमानुसार ऐसे जानवरों की मौत हो जाने या कोई अन्य स्थिति उत्पन्न होने पर संबंधित थाने को इसकी सूचना दी जानी आवश्यक होती है। इन जानवरों को बेचा नहीं जा सकता।
होता यह है कि पुलिसवालों से मिलकर गोतस्कर ही अपने या अपने खास लोगों को ये जानवर सुपुर्द करा देते हैं। कुछ दिन बाद फिर इन जानवरों को तस्कर निर्धारित गंतव्य तक भेज देते हैं। चूंकि गोवंशों की बरामदगी और सुपुर्दगी के बाद आम लोगों का ध्यान इस ओर से हट जाता है, इसलिए यह सारा काम बड़ी आसानी से चलता रहता है। पिछले दिनों एसपी से जब आरटीआई के तहत गोवंशों की बरामदगी, दर्ज मुकदमे और उनकी वर्तमान स्थिति की बाबत जानकारी मांगी गयी तो पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया। काफी टालमटोल के बाद जो आधी-अधूरी सूचना मिली, उसमें यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि पुलिस के पास इन गोवंश के बारे में अब कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
एसपी ऑफिस से मिली सूचना के मुताबिक वर्ष 2001 से लेकर जुलाई 2012 तक खड्डा थाने में गोवध निवारण अधिनियम के तहत कुल 82 मामले दर्ज हुए। इन मामलों में 756 पशु बरामद हुए, जिन्हें थानाक्षेत्र के विभिन्न लोगों की सुपुर्दगी में दे दिया गया। इस सूचना के अनुसार वर्ष 2001 में 307, वर्ष 2002 में 178, वर्ष 2003 में 86, वर्ष 2004 में 110, वर्ष 2005 में 31, वर्ष 2006 में 32 और वर्ष 2007 में पांच पशु बरामद हुए। वर्ष 2008 और 2009 में कोई बरामदगी नहीं हुई लेकिन वर्ष 2010 में सात पशु मिले। वर्ष 2010 से वर्ष 2012 तक की कोई जानकारी नहीं दी गयी है। इन मामलों में सैकड़ों अज्ञात लोगों के विरुद्ध मुकदमा भी दर्ज हुआ है। ऐसे ही नेबुआ नौरंगिया में भी वर्ष 2001 से 2012 तक गोवध के कुल 42 मामले दर्ज हैं। इनमें 221 पशु बरामद किए गए। इनमें से एक पशु की मौत हो गयी जबकि शेष 220 जानवर सुपुर्द किए गए।
इन दोनों थानों की पुलिस ने इनमें से दर्जन भर से ज्यादा मामलों में फाइनल रिपोर्ट लगा दी है। उन मामलों में बरामद गोवंश की नीलामी नहीं हुई। पुलिस यह भी बता पाने की स्थिति में नहीं है कि इनमें से कितने गोवंशों की मौत हो चुकी है। वजह यह कि किसी का पोस्टमार्टम नहीं हुआ है जबकि ऐसे जानवरों की मौत के बाद पोस्टमार्टम जरूरी होता है। इस संबंध में सीओ खड्डा विनोद कुमार यादव का कहना है कि सुपुर्दगी में देने के बाद पुलिस का काम खत्म हो जाता है। अगर कोई सुपुदर्गी वाले गोवंश को बेचे जाने की शिकायत करता है तो उसकी जांच करायी जाएगी।
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