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हर वर्ष काम, फिर भी कमजोर हैं तटबंध

Kushinagar

Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
खड्डा। नारायणी के कहर से लोगों को बचाने के लिए तटबंधों पर अब तक अरबों खर्च हो चुके होंगे। नदी के किनारे सैकड़ों किलोमीटर लंबाई में बने बांध पर हर वर्ष काम होता है, लेकिन रणनीति के तहत कार्य न होने से लोगों को बाढ़ विभीषिका झेलने को विवश होना पड़ता है।
नारायणी यानी बड़ी गंडक नदी हिमालय के धवलागिरी पर्वत तिब्बत क्षेत्र से निकलती है। अपने उद्गम स्थल से अंतिम पड़ाव बिहार के सोनपुर के पास गंगा नदी तक इसका विस्तार है। यह नदी तीन देशों तिब्बत, नेपाल व भारत के हजारों वर्ग किमी एरिया को प्रभावित करती है। नेपाल के वाल्मीकिनगर बैराज के पास भारत में प्रवेश करती है और बिहार क्षेत्र में बहने के बाद उत्तर प्रदेश के महराजगंज जनपद होकर कुशीनगर पहुंचते हुए फिर छितौनी बगला रेल सड़क पुल के कुछ आगे बिहार में प्रवेश करती है। तिब्बत तथा नेपाल में वर्षा होने पर बाढ़ आती है। 15 जून से 15 अक्टूबर तक बरसात के समय नदी तबाही मचाती है और इसी से बचने के लिए नदी के तटों पर बांध का निर्माण कराया गया। तटबंधों की लंबाई नेपाल में 24 किलोमीटर, उत्तर प्रदेश में 106 किलोमीटर एवं बिहार में 40 किलोमीटर, मिलाकर कुल 170 किलोमीटर, है। इन बंधों से लगभग आठ हजार हेक्टेयर जमीन नेपाल की, 83486 हेक्टेयर उत्तर प्रदेश की तथा 20 हजार हेक्टेयर बिहार की जमीन मिलाकर कुल 1 लाख 11 हजार 486 हेक्टेयर जमीन की सुरक्षा इन बंधों से होती है।
नदी से सुरक्षा के लिए वर्ष 1968-69 में छितौनी बांध, 1971-72 में नौतार बांध, 1972-73 में रेलवे इम्बेकमेंट बांध, 1982 में कटाई भरपुरवा बांध, 1980-81 में सीपी तटबंध, 1980-81 में ही अमवा खास बांध व अमवा रिंग बांध, 1985 में पिपरासी रिटायर बांध, अहिरौली पिपराघाट, जमींदारी बांध आदि बनवाए गए। वर्ष 1968-69 में बनाए गए छितौनी बांध पर 4 करोड़ 68 लाख 82 हजार, 1971-72 में बने नौतार बांध पर 13 करोड़ व 1972-73 में बने रेलवे इम्बेकमेंट बांध पर 7 करोड़ 64 लाख खर्च हुआ। सूत्रों के अनुसार रखरखाव के मद में ही कुछ वर्ष पहले तक छितौनी बांध पर करीब 84 करोड़, नौतार बांध पर 22 करोड़ व रेलवे बांध पर करीब 66 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं। ऐसे ही अन्य बंधों के रखरखाव पर बड़ी धनराशि खर्च हुई है। लेकिन हर वर्ष तटबंध कमजोर होते हैं। बाढ़ खंड के एसडीओ डीके त्रिपाठी का कहना है कि बाढ़ का स्थायी समाधान नहीं है। नदी पहाड़ से सीधे मैदान में आती है। बहाव तेज रहता है और नदी की धारा भी बदलती रहती है। यही कारण है कि बहाव के मद्देनजर हर वर्ष काम कराना पड़ता है।
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