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फरियादियों की दरख्वास्त से चलती है रोजी

Kushinagar

Updated Fri, 07 Sep 2012 12:00 PM IST
पडरौना (कुशीनगर)। ‘कोशिश कोई करके देखे सपने सच्चे भी होते हैं, दुनिया कोई इतनी बुरी नहीं यहां लोग अच्छे भी होते हैं।’ इसे साबित कर दिखाया है जिले के डीएम ने। उनकी एक पहल से आज नौ विकलांग युवक-युवतियाें के दिन बहुर गए हैं। कल तक उन्हें एक-एक रुपये के लिए दूसरों का मोहताज रहना पड़ता था, लेकिन आज वे खुद सक्षम हैं दूसरों की छोटी-छोटी मदद के लिए।
डीएम दरबार में फरियाद सुनाने जिले के विभिन्न हिस्सों से बड़ी संख्या में लोग हर कार्य दिवस में आते हैं। इनमें से तमाम ऐसे लोग होते हैं जो या तो निरक्षर होते हैं अथवा कम पढ़े-लिखे होने के कारण प्रार्थना-पत्र नहीं लिख सकते। कई फरियादियों के प्रार्थना पत्र तो ऐसे होते थे, जो स्पष्ट ही नहीं होते। उधर पकड़ियार निवासी रमेश कुमार गुप्ता, सज्जन छपरा के सिंहासन गुप्ता, इंद्रजीत यादव, गनेशीपट्टी की माया शर्मा और रविता शर्मा, हाटा निवासी दीपक तिवारी, साढ़ी बुजुर्ग की सुनीता शर्मा, रामकोला की शोभा वर्मा तथा पडरौना नगर के नौका टोला की रिजवाना खातून (पति विकलांग एवं गरीब) ने दो महीने पहले डीएम को प्रार्थना पत्र सौंपकर बताया था कि विकलांगता के बावजूद उनमें से कुछ स्नातक तथा कुछ परास्नातक तक पढ़े हैं, जबकि कुछ की पढ़ाई अभी चल रही है। परंतु कहीं काम नहीं मिल रहा है। इन विकलांग युवक-युवतियों ने काम दिलाने की गुहार लगाई थी। दोनों समस्याओं को एक साथ सुलझाने का डीएम रिग्जियान सैंफिल ने एक रास्ता निकाला। उन्होंने विकलांग युवक-युवतियों को प्रार्थना पत्र लिखने के लिए प्रशिक्षित कराना शुरू किया। इनको प्रार्थना पत्र लिखने के लिए प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी एबीआरसी पडरौना जितेंद्र सिंह को सौंपी गई। एबीआरसी प्रतिदिन दोपहर दो बजे से शाम चार बजे तक कलेक्ट्रेट जाकर इन विकलांगों को प्रशिक्षण देते हैं कि किस अधिकारी को किस तरह से प्रार्थना पत्र लिखना है। डीएम की इस पहल का नतीजा यह हुआ कि फरियाद लेकर आए लोगों को प्रार्थना पत्र लिखने के लिए कहीं भटकना नहीं पड़ता है। इन्हें निर्देश दिया गया है कि प्रार्थना पत्र लिखने के एवज में किसी भी फरियादी से दस रुपये से अधिक न लिया जाय। यदि कोई गरीब इतना भी देने में सक्षम नहीं है तो उसकी दरख्वास्त मुफ्त में लिखें। कलेक्ट्रेट पर फरियाद लेकर प्रति कार्यदिवस औसतन 200 लोग आते हैं। काम के अंत में सभी रुपये एकत्र करके बराबर-बराबर हिस्से लगाए जाते हैं और फिर इन विकलांगाें में बांटे जाते हैं। विकलांग रमेश कुमार गुप्ता कहते हैं कि डीएम साहब के इस उपाय ने हमारी काफी समस्याएं हल कर दी हैं।
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