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11 साल से दूसरों के लिए लड़ रहे

Kushinagar

Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
कसया। अपनी माटी को मां समझने वाले किसानों की व्यथा ने डुमरी गांव के रहने वाले गोवर्धन गौंड़ के मन को इस कदर झकझोरा कि 11 साल पहले वे अपना घर छोड़कर आम लोगों के लिए आंदोलन करने निकल पड़े। मैत्रेय परियोजना से प्रभावित हो रहे आठ गांवों के किसानों की लड़ाई लड़ रहे गोवर्धन पिछले पांच साल से केवल एक वक्त ही भोजन करते हैं। किसानों की इस लड़ाई के प्रति गोवर्धन के जुनून का आलम यह है कि सिसवा महंथ चौराहा स्थित आंदोलन स्थल से महज डेढ़ किलोमीटर दूर अपने घर भी वे बेहद जरूरी होने पर ही जाते हैं।
पचास साल की उम्र पार कर चुके गोवर्धन गौंड़ ने वर्ष 1982 में दर्शन शास्त्र और हिंदी विषय से स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद एलएलबी में नामांकन कराया लेकिन आर्थिक तंगी के चलते पढ़ाई बीच में ही छूट गई। पुश्तैनी जमीन के नाम पर सिसवा महंथ ग्राम सभा में महज तीन डिस्मिल ही खेत था। खर्च चलाने के लिए कसया में फोटोग्राफी का काम करने लगे। कई सालों की मेहनत के बाद कुछ पैसा जोड़कर सिसवा महंथ गांव में 12 डिस्मिल जमीन खरीदे। वर्ष 2000 में मैत्रेय परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण की खबर ने इन्हें झकझोर दिया। जो जमीन अधिग्रहीत होनी थी उसमें सिसवा महंथ गांव स्थित गोवर्धन की 15 डिस्मिल जमीन भी है। जमीन निकल जाने से भूमिहीन हो रहे परिवारों की व्यथा को भला गोवर्धन से बेहतर कौन समझ सकता था? वर्ष 2001 में मैत्रेय परियोजना से प्रभावित सिसवा महंथ, बेलवा पलकधारी, डुमरी, अनिरुद्धवां, विशुनपुर विंदवलिया आदि के ग्रामीणों की एक मीटिंग सिसवा महंथ चौराहे पर हुई। दर्शन शास्त्र के छात्र रहे गोवर्धन को भूमिहीन हो रहे इन किसानों की पीड़ा ने इतनी तकलीफ पहुंचाई कि उसी पल इन गरीबों की लड़ाई को अपनी लड़ाई मानकर आंदोलन की घोषणा कर दी। किसानों की ओर से गठित भूमि बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष बने गोवर्धन तब से लेकर आज तक तमाम तकलीफों को भी सहर्ष सहते हुए आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं। इन 11 सालों के दौरान गोवर्धन अपने घर तभी गए होंगे जब कोई बहुत जरूरी काम पड़ा होगा। सिसवा महंथ चौराहे पर एक झोपड़ी डालकर क्रमिक धरना दे रहे गोवर्धन 16 जून 2007 केवल एक वक्त शाम को ही भोजन करते हैं।
बचपन से ही है ललक
कसया। गोवर्धन बताते हैं कि जब वे 12-13 साल के थे तब गोड़ जाति के सम्मेलन का एक पोस्टर पढ़े। यह सम्मेलन हावड़ा (कोलकाता) में होना था। न जेब में पैसा था न ही रास्ता मालूम था लेकिन वहां जाने की ललक में घर से भागकर देवरिया पहुंचे और कोलकाता जाने वाली ट्रेन में बिना टिकट ही चढ़ गए। पूछते-पूछते कोलकाता से पहले लिलुआ नामक स्टेशन पर उतर गए। यहां कुछ लोग मिले जिन्होंने बालक गोवर्धन को गोड़ जाति के इस सम्मेलन स्थल तक पहुंचाया। लोगों ने ही इन्हें आयोजकों से मिलवाया। सम्मेलन समाप्त होने के बाद आयोजकों ने 40 रुपया देकर इन्हें देवरिया आने वाली ट्रेन में बैठा दिया था।
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