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बरसात नजदीक, स्थायी पिलर का काम रुका

Kushinagar

Updated Thu, 07 Jun 2012 12:00 PM IST
खड्डा। प्रशासनिक उदासीनता के कारण यूपी बिहार के किसानों में कभी भी सीमाई विवाद को लेकर संघर्ष हो सकता है। बरसात शुरु होने को है और कार्यदायी संस्था धन के अभाव में पिलर नहीं लगा पा रहा है। किसानों को अंदेशा है कि बरसात के बाद दोनों प्रांतों के जिम्मेदारों की कड़ी मशक्कत के बाद हुए सीमांकन के चिह्न भी मिट जाएंगे। ऐसे में एक बार फिर सीमाई विवाद को लेकर मारामारी मचेगी।
उत्तर प्रदेश के कुशीनगर जनपद के पडरौना तहसील क्षेत्र का खड्डा व बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के बगहां अनुमंडल की सीमा एक दूसरे से मिलती हैं। चूंकि, नदी की धारा लगातार अपना मार्ग बदली है इसलिए दोनों प्रांतों के बीच की सीमाएं भी नदी की बदलती धारा के साथ विलुप्त हो गई। ऐसे में नदी किनारे बसे दोनों प्रांतों के किसानों में अपनी जमीनों को लेकर संघर्ष की नौबत आ जाती है। जमीनों को लेकर होने वाले इन संघर्षों को देखते हुए दो वर्ष पूर्व दोनों प्रांतों के वरिष्ठ अधिकारियों की एक मीटिंग हुई जिसमें सीमांकन कराने का निर्णय लिया गया। फिर दोनों तरफ के राजस्व, प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों सहित भारी मात्रा में पुलिस फोर्स की मौजूदगी में दस दिनों तक सीमांकन का कार्य कराया गया। उत्तर प्रदेश के मरचहवां, बसंतपुर, बाल गोविंदछपरा, शाहपुर, ज्वालापुर, विशेषरपुर, शालिकपुर, महदेवा आदि तथा बिहार के मुजहीं, रजहीं, मदनपुर, भैसहिया आदि दर्जनों गांवों में सीमांकन कर विवाद पर लगाम लगाया गया। इसके बाद तय हुआ कि चिह्नित सीमाओं पर स्थायी पिलर लगाए जाएंगे, ताकि विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो जाए। कुशीनगर जिला प्रशासन ने स्थायी पिलर लगाने के लिए दस लाख रुपये की लागत में 360 पिलर भी मंगा लिया। लेकिन एक बरसात बीतने के बाद भी नहीं लगाए जा सके। इसका नतीजा यह हुआ कि कई जगहों के अस्थायी चिह्न मिट गए हैं। धीरे धीरे मिट रहे निशान को देखते हुए जिलाधिकारी कुशीनगर ने टेंडर आमंत्रित कर जनवरी 2012 में उत्तर प्रदेश लघु उद्योग निगम लिमिटेड को तीन लाख रुपये में स्थायी पिलर लगाने का काम सौंपा। कार्यदायी संस्था ने काम शुरु भी करा दिया। लेकिन संस्था को काम कराने के लिए मिला चेक नाम पेमेंट में वापस हो गया। संस्था के अधिशासी अभियंता राजीव त्रिपाठी का कहना है कि दो बार चेक नाम पेमेंट में वापस हो चुका है। ऐसे में काम कराना मुश्किल प्रतीत होता है। उधर, काम रुक जाने से किसानों को एक बार फिर भय सताने लगा है कि इस बार के बरसात में अस्थायी सीमांकन पूरी तरह से पानी में विलीन हो सकता है और फिर से संघर्ष की नौबत आ जाएगी। यही नहीं, उनकी खेती-बारी भी चौपट हो जाएगी।
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