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क्रांतिकारी लियाकत अली के ‘जलवा-जलाल’ को भूल गया कौशाम्बी

Allahabad Bureau

Allahabad Bureau

Updated Mon, 14 Aug 2017 12:40 AM IST
क्रांतिकारी लियाकत अली के ‘जलवा-जलाल’ को भूल गया कौशाम्बी
अंडमान निकोबार में बनी है मजार मगर कौशाम्बी में वह पहचान के लिए मोहताज
वर्ष 1857 में क्रांति का बिगुल फूंक सदर तहसील पर किया था कब्जा, भाग खड़े हुए थे अंग्रेज
अमर उजाला ब्यूरो
चायल।
महान क्रांतिकारी मौलाना लियाकत अली खान। ब्रितानिया हुकूमत में जब-जब यह नाम लिया जाता था तो अंग्रेज कांप उठते थे। नाम की इतनी दहशत थी कौशाम्बी के महगांव निवासी क्रांतिकारी मौलाना लियाकत अली खान की। वर्ष 1857 में क्रांतिकारियों की अगुवाई करते हुए मौलाना ने इलाहाबाद की सदर तहसील पर कब्जा किया। कई अंग्रेज मारे गए थे और आधे से ज्यादा भाग गए थे। पूरी रियासत पर कब्जा करने के बाद अपनी सरकार भी मौलाना ने चलाई थी। इसके बाद उन्हें अंग्रेजों ने पकड़ा और काला पानी की सजा सुनाई। अंडमान निकोबार की सेल्यूलर जेल में उन्हें बंद किया गया था लेकिन उनकी देशभक्ति देखकर फांसी नहीं दी गई थी। देश के लिए शहीद हुए इस वीर सपूत को कौशाम्बी भूल चुका है। यहां न तो उनकी कोई निशानी है न ही उन्हें कोई याद करने वाला, सिवाय महगांव इंटर कालेज के छात्रों के।
चायल तहसील के महगांव निवासी मौलाना लियाकत अली खान बचपन से ही उग्र स्वभाव के थे। देश गुलाम था, ब्रितानिया हुकूमत थी। बेटे के बागी तेवर से उनके पिता मेहर अली खान वाकिफ हो गए थे। इसलिए उन्होंने कभी उनको रोकने की कोशिश भी नहीं की थी। किशोरावस्था में ही अंग्रेजों का जुल्म देखकर मौलाना लियाकत अली खान ने बागी तेवर अपना लिया था। वह अपने साथियों की टोली के साथ आए दिन रणनीति बनाते थे। कम समय में ही वह बागी गुट के अगुवा भी बन गए थे। वर्ष 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ पूरे देश में बगावत की लहर चली तो मौलाना लियाकत अली खान खुलकर सामने आ गए और कांतिकारियाें की अगुवाई करते हुए सदर तहसील इलाहाबाद पर धावा बोल दिया। कई अंग्रेजों को मारकर कब्जा कर लिया। खुसरोबाग पर भी कब्जा जमाया। मौलाना लियाकत अली के जिगर को देखकर अंग्रेजों को वहां से भागना पड़ा था। मौलाना के जलवा व जलाल को देखते हुए छह इंफ्रंट्री बटालियन के रामचंद्र 150 फौजियों के साथ बगावत कर मौलाना के साथ हो लिए। इसके बाद क्रूर कर्नल कहे जाने वाली नील ने कमान संभाली। इसके बाद उनकी गिरफ्तारी हुई। मौलाना को काला पानी की सजा सुनाई गई। वहां की सेल्यूलर जेल में वह बंद रहे। वहां 17 मार्च 1881 को उनकी मृत्यु हुई। जहां अंग्रेजों ने दफन करने के बाद उनकी मजार बनवाई और फोटो व वीडियो परिजनों को भेजा। मौलाना के नाम पर दशक भर पहले तक लोग गर्व करते थे लेकिन युवा पीढ़ी जांबाज क्रांतिकारी को भूल चुकी है। उनको याद रखने के लिए ऐसा कोई इंतजाम भी नहीं किया गया है। न ही उनकी याद में कोई सड़क है न ही स्मृति स्थल। वह गुमनामी में खो चुके हैं। मौलाना के प्रपौत्र काजी मंसूर अहमद बताते हैं कि उनकी बेटी चांद बीबी को पेंशन मिलती थी। इसके बाद से पेंशन भी बंद हो चुकी है। क्रांतिकारी मौलाना लियाकत अली खान के नाम पर ऐसा कुछ नहीं है कि लोग याद रख सकें। यह सबसे दुखद है।

महगांव के लोगों की आवाज किसी ने नहीं सुनी
मौलवी लियाकत अली खान की याद में स्मृति स्थल और सड़क बनाने के लिए स्थानीय लोगों ने तमाम प्रयास किए लेकिन किसी ने भी ध्यान नहीं दिया। दरख्वास्त दी जाती रही और आश्वासन मिलता रहा लेकिन पहल अब तक नहीं हुई। इससे स्थानीय लोगों में निराशा है और वे सिस्टम को कोस भी रहे हैं।

पूर्व सांसद मजार तक गए लेकिन किया कुछ नहीं
सपा के पूर्व सांसद शैलेंद्र कुमार मौलाना लियाकत अली खान की मजार अंडमान निकोबार पांच बार जा चुके हैं। वहां उन्होंने मौलाना लियाकत अली खान को श्रद्धांजलि भी दी लेकिन कौशाम्बी के लोग उन्हें जानें, ऐसा वह सांसद रहते हुए भी कुछ नहीं कर सके। अब वह कहते हैं कि महगांव का नाम लियाकत अली नगर होना चाहिए। उनके नाम से सड़क होनी चाहिए। इसके अलावा जिले का प्रवेश द्वार उनके नाम से होना चाहिए।
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