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थाने में बैठे रईसजादे को कागजों में तलाश रही थी पुलिस

Kanpur

Updated Tue, 02 Oct 2012 12:00 PM IST
आशुतोष मिश्र
कानपुर। रईसजादे की कार की टक्कर से छात्र अमित शर्मा की मौत के में प्रकरण में आरोपी करन सूरी को बचाने की पुलिसिया साजिश की परतें अब खुलने लगी हैं। जिस अभियुक्त को लोगों ने मौके से पकड़कर पुलिस के हवाले किया था, उसकी गिरफ्तारी घटना के नौ घंटे बाद दोपहर 1.30 घटनास्थल से दिखाई गई। मूल घटना शनिवार पौने चार बजे तड़के की है। दोपहर 12 बजकर 3 मिनट पर हवालात में बंद अभियुक्त की फोटो ‘अमर उजाला’ के पास है
अभियुक्त हाथ में होने के बावजूद अज्ञात के खिलाफ एफआईआर की। यही नहीं पुलिस अधिकारी, ड्राइविंग लाइसेंस (डीएल) के बारे में झूठ बोल रहे थे कि शायद जमानत के मामले में कोर्ट में दाखिल किया हो। अमर उजाला की तहकीकात में पता चला है कि अभियुक्त के पास डीएल था ही नहीं, डीएल की डुप्लीकेट दुर्घटना के पांचवें दिन निकलवाई गई। अब इसकी फोटोप्रति घटना में पकड़ी गई एसयूवी को रीलीज कराने के लिए कोर्ट में दी गई अर्जी में लगाई गई है।
अमर उजाला ने इस मामले से जुड़े सभी कागजात जुटाए तो पुलिस की साजिश बेनकाब होती चली गई और साफ हो गया कि किसी लाभ के लालच में पुलिस ने कानून को ताक पर रख दिया। जानकारी के मुताबिक घटना के समय करन सूरी के पास ड्राइविंग लाइसेंस नहीं था, इसका प्रमाण ये है कि करन सूरी ने हादसे के पांचवें दिन 28 सितंबर-2012 को आरटीओ से डुप्लीकेट लाइसेंस जारी कराया। उसका लाइसेंस 13 सितंबर-2004 में बना है और 11 सितंबर-2024 तक वैध है। आरटीओ रिकार्ड के मुताबिक करन सूरी का डुप्लीकेट लाइसेंस पहली बार जारी नहीं हुआ है। करन इसके पहले दो बार और डुप्लीकेट लाइसेंस जारी करवा चुका है। दोनों ही बार करन ने लाइसेंस खोने का प्रार्थनापत्र पुलिस को दिया और इसके बाद आरटीओ से डुप्लीकेट लाइसेंस इश्यू कराया। कानपुर बार एसोसिएशन के पूर्व संयुक्त मंत्री कपिल दीप का कहना है कि लाइसेंस होने के बावजूद उसे ड्राइविंग के समय न रखना अपराध है। यह मोटर वाहन अधिनियम की धारा 183 (ड्राइविंग के समय लाइसेंस न रखना) का उल्लंघन है। इसमें अर्थदंड के साथ सजा का भी प्रावधान।
पुलिस ने मामला जमानती धारा 304ए के तहत दर्ज किया। वह थाने से जमानत भी देने की तैयारी में भी थी, मगर जब डीएल नहीं मिला तो उसे कोर्ट भेजने का नाटक किया गया। उसे संबंधित कोर्ट में पेश किया गया और वहां से उसे जमानत मिल गई। अदालत में दाखिल कागजात में भी डीएल नहीं संलग्न है। स्वरूपनगर प्रभारी विवेक सिंह ने विवेचक की लापरवाही को स्वीकारते हुए बताया कि जो भी चूक हुई है, उसे आगे विवेचना में नहीं होने दिया जाएगा।





आखिर पुलिस ने क्यों किया खेल

-प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक घटना के समय मौजूद लोगों ने करन सूरी को 23 सितंबर को सुबह 3.45 बजे मौके पर ही पकड़ लिया था। बाद में लोगों ने पुलिस के हवाले कर दिया था। अभियुक्त करन सूरी जिस इनोवा को चला रहा था वह पलट गई थी। इस कारण वह निकल नहीं सका था।

-लिखापढ़ी
विवेचक शिव कुमार सिंह ने थाने की जीडी में 23 सितंबर को दोपहर 1.50 बजे लिखापढ़ी की है। इसमें कहा गया है कि अभियुक्त करन सूरी को 23 सितंबर को दोपहर में 1.30 घटना स्थल के पास गिरफ्तार किया गया। उसने हाथ और सिर के पास चोट बताई थी। इसलिए दफ्तर में उसका मेडिकल कराने को कहा।

सवाल
सुबह 3.45 बजे घटना होने के बाद भी दोपहर 1.30 बजे तक यानी करीब 10 घंटे तक अभियुक्त घटना स्थल पर ही क्यों रुका रहेगा। इतनी बड़ी घटना के बाद कोई भी अभियुक्त होगा तो भागेगा।

हकीकत
अभियुक्त मौके पर पकड़ा गया। उसका नाम और पता भी पुलिस को पता चल गया था।

लिखापढ़ी
घटना की रिपोर्ट पहले अज्ञात में दर्ज में की गई थी। बाद में पुलिस ने उसके नीचे प्रकाश में आया अभियुक्त लिखते हुए तरन सूरी पुत्र रंजन सूरी पता 113/38 स्वरूप नगर लिखा। बाद में तरन पर ओवर राइटिंग करके करन सूरी किया गया है। नाम पर बाद में ओवर राइटिंग करके करन सूरी किया गया।

सवाल
जब अभियुक्त मौके पर ही पकड़ गया था तो रिपोर्ट अज्ञात में क्यों लिखी गई। इसके बाद तरन नाम लिखा और फिर करन सूरी। आखिर पुलिस को ओवरराइटिंग की जरूरत क्यों पड़ी?

हकीकत-
स्वरूप नगर थाने में सुबह 5.15 बजे दर्ज कराई गई रिपोर्ट में इनोवा चालक का नाम और पता अज्ञात लिखाया गया था?

लिखापढ़ी
विवेचक ने जीडी में लिखा है कि अमित शर्मा के शव का पंचनामा कराकर शव मोर्चरी में भेजने के बाद घटना स्थल पर गया और लोगों के गुस्से को देखते हुए तथा अभियुक्त के गिरफ्तारी से बचने के लिए छुप जाने की वजह से गिरफ्तार कर लिया गया।

सवाल
जब रिपोर्ट में वाहन चालक का नाम और पता अज्ञात लिखा गया था तो विवेचक को कुछ ही घंटे में अभियुक्त के नाम और पते की जानकारी कैसे हो गई?

हकीकत-
करन सूरी को थाने से भी जमानत मिल सकती थी। माना जा रहा है कि मामले के तूल पकड़ने और पुलिस को पाक साफ दिखाने की गरज से ही उसे थाने से जमानत नहीं दी गई। पर उसे जल्दी से कोर्ट में पेश किया गया। जमानतीय धारा का मामला होने पर उसे उसी दिन जमानत मिल गई।
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