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बेहमई कांड में 31 साल बाद पहली गवाही

Kanpur

Updated Tue, 25 Sep 2012 12:00 PM IST
कानपुर। चर्चित बेहमई कांड में 31 साल बाद सोमवार को पहली गवाही हुई। वादी ने अदालत में अपने बयान दर्ज कराते हुए 1 अभियुक्त के घटना में शामिल न होने की बात कही। साथ ही कहा कि इस कांड में आरोपी डाकू मान सिंह दो अलग-अलग व्यक्ति नहीं है। वह एक ही है। अपने पिता के 2 नामों का गलत फायदा उठा रहा है। 10 पेज के अपने बयान में वादी ने यह भी कहा है कि डाकू अक्सर गांव वालों पर राशन देने का दबाव बनाते थे। इसकी शिकायत उस समय थाना पुलिस और डीआईजी से की थी। अदालत ने अब इस मामले की रोज सुनवाई करने का फैसला सुनाया है।
14 फरवरी 1981 को कानपुर देहात के बेहमई गांव में सामूहिक रूप से 22 लोगों की हत्या कर दी गई थी। इसमें पहले चार डकैत फूलनदेवी, बाबा मुस्तकीम, रामऔतार और लल्लू को नामजद किया गया था। बाद में 30-35 अन्य लोग नामजद किए गए थे। 1981 में ही अलग-अलग सभी अभियुक्तों की चार्जशीट दाखिल कर दी गई थी। विशेष न्यायाधीश दस्यु उन्मूलन क्षेत्र/ एडीजे 7 रमाबाई नगर महमूद अहमद खान की कोर्ट ने इसी माह चार अभियुक्तों पर आरोप तय किए थे। सोमवार को अदालत में सुनवाई में अभियुक्त राम सिंह, भीखा, विश्वनाथ अदालत में पेश हुए। वादी राजाराम सिंह अपने वकील विजय नारायण सिंह सेंगर के साथ पहुंचे। एक अभियुक्त पोसा की हाजिरी माफी उसके वकील रघुनंदन सचान ने लगाई। वादी 62 वर्षीय राजाराम सिंह ने अपने बयान में कहा कि 14 फरवरी 1981 को बेहमई सामूहिक नरसंहार हुआ था। अदालत में हाजिर विश्वनाथ उर्फ किसन स्वरूप उस घटना में शामिल नहीं था। उस समय यह नाबालिग था। इसी नाम का महेशपुर गांव का निवासी विश्वनाथ उर्फ अशोक घटना में शामिल था। विश्वनाथ उर्फ किसन स्वरूप को पुलिस ने गलत फंसा दिया है। वहीं डाकू मान सिंह यादव पुत्र गिरई उर्फ पुस्सू ग्राम तेरही थाना कालपी जिला जालौन घटना में शामिल था। उसने बेहमई में सबसे ज्यादा गोलियां चलाकर लोगों को मारा था। इसी मान सिंह ने मध्यप्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री के सामने फूलन देवी के साथ आत्मसमर्पण किया था। वादी राजा राम सिंह ने यह भी कहा कि रिपोर्ट लिखाते समय उनका दिमागी संतुलन ठीक नहीं था। इसलिए तब मान सिंह का नाम रिपोर्ट में नहीं लिखाया था। वहीं आरोपी पोसा के वकील रघुनंदन सचान ने वादी से जिरह करते हुए कई सवाल किए। अब मंगलवार को फिर मामले की सुनवाई होगी।


अभियुक्तों की स्थिति
फूलनदेवी, मुस्तकीम, लल्लू और रामऔतार की मौत हो चुकी है। अभियुक्त गांव साला औरेया निवासी श्यामबाबू, महेशपुर सिकंदरा निवासी विश्वनाथ उर्फ पुतानी उर्फ अशोक और ग्राम पाल जालौन निवासी रामरतन फरार चल रहे हैं। कोर्ट से इनकी गिरफ्तारी और कुर्की केस्थायी आदेश हैं। मल्लाहनपुरवा रामपुरा जालौन निवासी राम सिंह 8 दिसंबर 2010 से इस मामले में कानपुर देहात जेल में बंद है। 2 जून 2012 को एडीजे 7 रमाबाई नगर कोर्ट से 30-30 हजार की दो जमानतों पर उसे रिहा करने का आदेश हो गया था। जमानतगीर न मिलने के कारण वह जेल में है।


कुछ इस तरह है वादी का बयान

‘14 फरवरी 1981 को दोपहर करीब 2.30 बजे थे। बेहमई गांव में दक्षिण की ओर से फूलन, मान सिंह, लल्ली, रामऔतार, विश्वनाथ उर्फ अशोक आदि 30-35 लोग आए और डाकू लालाराम-श्रीराम को ढूंढना शुरू कर दिया। एक-एक घर की तलाशी ली। जब वे नहीं मिले तो फूलन के गैंग ने पूरे गांव में लूट-पाट शुरू कर दी। घरों से पुरुषों को खींच-खींचकर बाहर निकाला और गांव के बाहर जमुना के किनारे ले जाकर सबको खड़ा कर दिया और फिर डाकुओं ने उन पर गोलियां बरसा दीं। पहली गोली मान सिंह ने चलाई। 25 लोगों को गोली लगी और 20 की मौत हो गई थी। फिर डाकू जंगल में भाग गए। डाकू मुस्तकीम गांव की घेराबंदी किए था। गांव में 3 बंदूके थीं। जिन्हें डकैत ले गए थे। डाकुओं के भागने के काफी देर बाद शाम को लगभग साढ़े 7-8 बजे सिकंदरा थाने में जाकर रिपोर्ट लिखाई। उस समय बीहड़ में 3 गैंग मुस्तकीम, फूलन और लालाराम थे। क्षेत्र में पहला सामूहिक नरसंहार दस्तमपुर में हुआ था। वहां मुस्तकीम गैंग ने 11 यादव मारे थे। उसके बाद बेहमई कांड हुआ था। फिर अस्ता हत्याकांड हुआ था। इसमें लालाराम-श्रीराम गैंग ने 11 मल्लाहों को मार दिया था। यह तीनों गैंग दिन-रात गांव में आते थे और खाना, दूध तथा घी ले जाते थे। न देने पर मारते-पीटते थे। गोली मारने की धमकी देते थे। इसकी शिकायत बेहमई कांड से पहले पुलिस और डीआईजी से मिलकर की थी। लालाराम-श्रीराम जब फूलन के साथ थे तब विक्रम मल्लाह डकैत को मार दिया था। फूलन डकैत विक्रम की प्रेमिका थी। उसी समय फूलन गैंग अलग हो गया था। फूलन गैंग जब गांव में आता था तो कहता था कि लालाराम गैंग को खाना मत दो। फूलन मानती थी बेहमई ठाकुरों का गांव है इसलिए लालाराम गैंग को पनाह देता है।
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