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दिमाग नहीं, दुकान से बन रहे हैं ‘आइन्स्टीन’

Kanpur

Updated Sun, 05 Aug 2012 12:00 PM IST
कानपुर। शहर के स्कूलों में आयोजित विज्ञान प्रदर्शनियों में शामिल होने वाले स्टूडेंट्स हों या भविष्य के टीचर (बीएड स्टूडेंट्स) जो भी प्रोजेक्ट प्रस्तुत कर रहे हैं, ज्यादातर उनके खुद के क्रिएशन नहीं बल्कि बाजारों में बनवाए जा रहे हैं। शहर में ऐसे मॉडल्स बनाने की कई दुकानें चल रहीं हैं। रुपए फेंकिए और बनवा लीजिए कैसा भी मॉडल, जिसके पीछे खड़ा बच्चा खुद का अविष्कार बताते हुए वही बताएगा जो उसको दुकानदार ने रटाया होगा। स्कूलों में लगने वाली विज्ञान प्रदर्शनी के संदर्भ में ‘अमर उजाला’ ने गहराई से पड़ताल की तो यह कड़वी हकीकत सामने आई। स्टूडेंट में क्रियेटिविटी और वैज्ञानिक प्रतिभा विकसित करने के लिए की जाने वाली यह एक्टिविटी आज महज कुछ दुकानदारों के रोजगार का जरिया बन कर रह गई है।
देखने में यह सब कुछ जितना सहज लगता है, स्टूडेंट्स की पर्सनालिटी पर इस प्रवृत्ति का उतना ही गहरा दुष्परिणाम पड़ता है। यह प्रवृत्ति स्टूडेंट के मासूम व्यक्तित्व को प्रभावित कर उन्हें झूठ छल-छद्म सिखा रही है। महज 10 प्रतिशत स्टूडेंट्स भी नहीं होंगे, जो खुद कोई मॉडल सृजन करते हैं। वो इंटरनेट की विभिन्न वेबसाइट्स से ऐसे वैज्ञानिक मॉडल्स को बनाने की विधि डाउनलोड करके बाजार से असेम्बल करा ले रहे हैं। कई तो यह जहमत भी नहीं उठाते, रेडीमेड मॉडल बाजारों में उपलब्ध हैं न। ऐसा नहीं है कि यह सब टीचर्स को नहीं मालूम, मगर इस प्रवृत्ति को हतोत्साहित करने की बजाए, वे प्रोत्साहित कर रहे हैं। ऐसी प्रदर्शनियों में कॉलर उठाए स्टूडेंट के टीचर ऐसा पोज करते नजर आएंगे, जैसे उनके मार्गदर्शन में स्टूडेंट्स ने एक बड़ा अविष्कार कर लिया हो। बाजार से खरीदे हुए मॉडलों पर पुरस्कार पाने वाले स्टूडेंट्स के पैरेंट्स को बच्चे के साथ किसी अखबार के दफ्तर में देखिए, सरासर झूठ बोलते मिल जाएंगे कि बच्चे ने यह इंवेंशन कैसे किया ? सोचिए, समर्थ परिवार के बच्चे जब बड़ी रकम खर्च करके बनवाए गए मॉडल्स पर पुरस्कार जीतते हैं तो सामान्य परिवार के स्टूडेंट्स पर क्या गुजरती होगी?
तीन वर्ष पहले मिसाइल मैन, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम शहर में कमला नगर स्थित एक पब्लिक स्कूल की साइंस एग्जीबिशन में बतौर मुख्य अतिथि आए थे। बच्चों ने उन्हें अपने-अपने मॉडल दिखाए थे। डॉ.कलाम ने साइंस मॉडल बनाने वाले बच्चों से प्रश्न किए थे और कहा था ‘आल्वेज कम विद क्वेश्चन्सस एंड आईडियाज। दे विल इग्नाइट योर माइंड’ (हमेशा अपने प्रश्नों, जिज्ञासाओं और विचारों को जुबां पर लाओ वो आपको कुछ करने की प्रेरणा देंगे)। डॉ.कलाम वापस चले गए। शहर के स्कूलों के स्टूडेंट्स और पैरेंट्स ने डॉ.कलाम की नसीहत को गंभीरता से नहीं लिया। शनिवार को ‘अमर उजाला’ रिपोर्टर ने बीएनएसडी शिक्षा निकेतन में लगी विज्ञान प्रदर्शनी में मॉडल्स प्रस्तुत कर रहे स्टूडेंट से सवाल किए तो जो जवाब मिले वह कहीं से भी डॉ. कलाम की नसीहत के अनुकूल नहीं थे।
बाजार को कमाई करनी आती है, उसने इस प्रवृत्ति को इनकैश करना शुरू कर दिया है। किसी भी तरह का साइंस मॉडल शहर की कुछ खास स्टेशनरी दुकानाें पर दस दिन के अंदर तैयार हो जाता है। हाफ शीट वाले थर्माकोल मॉडल 100 रुपये में और फुल शीट वाले 200 रुपये में हैं। वर्किंग मॉडल की कीमत 400 रुपये से शुरू है। जटिल वर्किंग मॉडल पांच हजार रुपये तक में उपलब्ध हैं। ‘अमर उजाला’ संवाददाता ने जरूरतमंद पैरेंट बन कर शनिवार को ऐसी दुकानों का जायजा लिया। जो कुछ सामने आया हूबहू पेश है, पाठकों से अनुरोध है कि एक बार जरूर सोचें कि क्रियेटिविटी की यह तिजारत बच्चों के लिए कितनी फायदेमंद है?


स्थान-आधुनिक स्टेशनर्स
80 फिट रोड
शनिवार-12:30 बजे

स्टेशनरी खरीदने के लिए कई स्टूडेंट खड़े हैं। कुछ पहले से बुक कराए मॉडल भी मांग रहे हैं। रिपोर्टर ने पूछा, 11 वीं में पढ़ने वाले भाई के लिए मॉडल बनवाना है। दुकान पर मौजूद अभिषेक ने सहज रूप से तैयार होने वाले मॉडल और उनकी कीमत बयां कीं। जब उनसे पूछा कि ऐसा कोई मॉडल तैयार हो सकता है जिससे भाई को विज्ञान प्रदर्शनी में पुरस्कार मिल जाए। उन्होंने कहा, थोड़ीदेर इंतजार कीजिए। जो मॉडल तैयार करता है वो आने वाला है। उससे विस्तार से बात कर लीजिए। आधा घंटे बाद मॉडल बनाने वाला शालू आ गया। बोला, डिजाइन दे दीजिए किसी भी तरह का मॉडल बन जाएगा। यही नहीं, आपके भाई को उसकी थ्योरी और चलाने का तरीका भी समझाएंगे। कोई डिजाइन नहीं है तो भी हम मॉडल बना देंगे। शालू ने यह भी बताया कि उनके बनाए हुए कई मॉडल शहर के साथ ही दूसरे शहरों की प्रतियोगिता में पुरस्कार पा चुके हैं। कानपुर में ही तैनात एक पूर्व ब्रिगेडियर की बेटी देहरादून से डेंटिस्ट की पढ़ाई कर रही थी। उसके लिए 5500 का मॉडल तैयार किया था। खुश होकर ब्रिगेडियर ने दो हजार अतिरिक्त दिए थे। उन्होंने कई पब्लिक स्कूलों के नाम गिनाए जिनके बच्चे अक्सर मॉडल तैयार कराते हैं।

स्थान- सत्कार
किदवई नगर
शनिवार- 3 बजे
किदवई नगर म्यूजिकल फाउंटेन के सामने ‘सत्कार’ के संचालक दो लड़कियों को सामान दे रहे हैं। तब तक एक लड़की आई और बोली अंकल मैं कार्डबोर्ड ले जाना भूल गई थी। ये वाला है क्या मैं ले जाऊं। संचालक सरदार जी बोले, भूल क्यूं गईं। चलो ले जाओ। संवाददाता द्वारा भाई के लिए मॉडल की मांग रखने पर बोले, आप बताइए कौन सा मॉडल बनवाना है। उसकी डिजाइन दिखवाइए तभी बन पाएगा। बातों से तो बनेगा नहीं। जब आप हमें दिखाएंगे कि कौन सा मॉडल बनवाना चाहते हैं उसे देख कर ही हम तय कर पाएंगे कि बनेगा या नहीं। आप कोई अनोखी चीज ले आए जिसका सामान ही नहीं मिल रहा तो हम कैसे बनाएंगे। दुकान में कई थर्माकोल के मॉडल रखे थे। उनकी कीमत पूछने पर भड़क गए। बोले आपके लिए नहीं हैं। पहले आर्डर मिले थे उनका तैयार माल है। आप तो अपने मॉडल की बात कीजिए।

स्थान- कला मंदिर
विद्यार्थी मार्केट, गोविंद नगर
शनिवार - 4:30 बजे
गोविंद नगर विद्यार्थी मार्केट में कलामंदिर पर आर्ट और क्राफ्ट का सामान बिक रहा है। दो महिला सामान देख रही हैं। इस बीच एक व्यक्ति कलामंदिर होजरी का पता पूछता है। इसके बाद दुकान संचालक संवाददाता से रूबरू होता है। संवाददाता अपने भाई के लिए साइंस मॉडल बनवाने की बात करता है। इस पर संचालक कहता है मॉडल बन तो जाएगा पर होगा थर्माकोल का। कोई भी वर्किंग मॉडल नहीं बनाते। थर्माकोल पर किसी भी तरह का मॉडल कहा कि वो सिर्फ थर्माकोल पर बनने वाले मॉडल ही तैयार करते हैं। रेट भी बता डाले। कहा, थर्माकोल हाफशीट पर मॉडल सौ रुपये का बनेगा और फुल शीट वाला दो सौ रुपये में। टाइम कितना लगेगा पूछने पर कहा कम से कम चार-पांच दिन। बाकी डिजाइन देखने पर ही बता पाएंगे।


मॉडल कीमत (रुपये में)
वाटरलेवल इंडीकेटर 400
क्लैप स्विच (ताली बजाने पर जलने वाला) 400
फायर अलार्म (आग लगने पर बजने वाला) 400
वोलकैनो (ज्वालामुखी) 400
आटोमेटिक लिफ्ट 700
डे-नाइट (गांव में स्वचालित विद्युतीकरण) 1200
स्पेशल मॉडल 2 से 5 हजार

बच्चे और समाज दोनों के लिए घातक
बच्चों से ज्यादा दोष पैरेंट और टीचर का है। बने बनाए मॉडल बच्चाें को दिलाकर वो उनकी क्रिएटिविटी को खत्म कर रहे हैं। क्रिएटिविटी बच्चों की सोचने की शक्ति को बढ़ाती है। वो कुछ नया करते हैं। यह उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बनता है। बच्चों की प्रतिभा खत्म कर पैरेंट और टीचर उन्हें ऐसा नागरिक बना रहे हैं जो भविष्य में सफलता के लिए कोई भी रास्ता अपनाने से नहीं हिचकेगा। यह उस बच्चे और समाज दोनों के लिए गलत है।
डॉ.विपुल सिंह, मनोवैज्ञानिक
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