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नकली दवाओं के गुनाह पर पड़ा परदा

Kanpur

Updated Mon, 14 May 2012 12:00 PM IST
कानपुर। अब कभी पता नहीं चल पाएगा कि पांच साल पहले भेजे गए सैंपलों की दवाएं असली थीं कि नकली। इन सैंपलों में भरी दवाओं की एक्सपायरी डेट लैब में रखे-रखे ही निकल गई। लैब ने यह कहते हुए हाथ खड़े कर दिए हैं कि अब इनकी जांच करना बेकार है। इनसे कुछ नहीं पता चलने वाला। इससे नकली दवाओं के बड़े गुनाह पर हमेशा के लिए परदा पड़ गया है।
नकली दवाओं के खिलाफ अभियान के दौरान 2007-09 के बीच ड्रग विभाग में दो सौ से अधिक सैंपल जांच के लिए लखनऊ स्थित लैब राजकीय विश्लेषक भेजे थे। इन सैंपलों को बिरहाना रोड स्थित थोक बाजार, नौबस्ता, रतनलालनगर, शिवराजपुर, बिल्हौर और घाटमपुर समेत जिले के विभिन्न स्थानों पर चल रहे मेडिकल स्टोरों से लिया गया था। इसमें शहर के सरहदी इलाके में घर में चल रही दवा फैक्टरी के सैंपल भी थे। इसके अलावा वर्ष 2010-11 में भी दो सौ सैंपल जांच के लिए राजकीय विश्लेषक को भेजे गए थे।
ड्रग इंसपेक्टर एके जैन ने बताया कि लैब ने सूचित किया है कि करीब डेढ़ सौ दवाओं के सैंपल की जांच एक्पायरी डेट निकल जाने की वजह से नहीं हो सकती। जिन दवाओं की जांच नहीं हो पाई, उनमें नीमोस्लाइड, पैरासीटामाल, एस्प्रिन, एंटी बायटिक के कैप्सूल, टेट्रासाइकलीन, कफ सिरप, लीवर टॉनिक आदि थीं।

सांठगांठ तो नहीं!
नकली दवाओं के सैंपल तो भर लिए जाते हैं, लेकिन ज्यादातर मामले रफा-दफा हो जाते हैं। जिसके यहां से सैंपल भरे जाते हैं, वह मैनेज करने में जुट जाता है। सालों सैंपल की रिपोर्ट आती ही नहीं है। कभी लखनऊ से सैंपल को कोलकाता की लैब भेज दिया जाता है। तब तक दवा की एक्सपायरी डेट निकल पाती है। इक्का-दुक्का के खिलाफ ही वाद दाखिल हो पाता है।


शेष के साथ----

दोषी कौन!
कानपुर। दवाओं के सैंपलों की जांच न हो पाने की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार नहीं है। कार्यवाहक ड्रग लाइसेंस अथॉरिटी एएल आर्या कहते हैं कि लैब दरअसल संयुक्त निदेशक गिरधरदास के अंडर में है। कोई जानकारी के लिए उन्हें संयुक्त निदेशक से पूछना पड़ता है। दवाओं के सैंपल की जांच क्यों नहीं हो पा रही है। इसकी जानकारी लैब से लेने के बाद बता पाएंगे। इधर गिरधरदास कहते हैं कि एक दवा की जांच में 3 से 14 दिन का समय लगता है। लैब में विश्लेषकों की कमी है और जांच का लोड काफी अधिक। इसलिए ऐसी दिक्कतें आना स्वभाविक है। यही नहीं ड्रग विभाग में किसी गड़बड़ी के लिए कोई जवाबदेह नहीं है। महत्वपूर्ण पद खाली पड़े हैं। इस वक्त विभाग के शीर्ष अफसरों में न तो कोई ड्रग कंट्रोलर है और न डिप्टी ड्रग कंट्रोलर। खानापूरी के नाम पर मंडल स्तर के अधिकारी एएल आर्या को चार्ज दे दिया गया है। कानपुर समेत कई मंडलों में मंडलीय ड्रग निरीक्षक नहीं हैं। एक इंसपेक्टर को दो से पांच जिले जांच के लिए दे दिए गए हैं।

नित्यानंद कमेटी की रिपोर्ट ठंडे बस्ते में
ड्रग विभाग को दो साल पहले अलग विभाग का दर्जा दिया गया है। पहले यह विभाग पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के पास था और अब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पास है। अनिल कुमार वाजपेयी ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस पर 12 साल पहले डॉ. नित्यानंद कमेटी का गठन किया गया था। कमेटी ड्रग को अलग विभाग बनाए जाने की सिफारिश की थी। इसके साथ ही एलोपैथ, होम्योपैथ, आयुर्वेद आदि दवाओं की एक ही लैब में जांच के लिए कहा था। लेकिन मानक पूरे नहीं हुए। कमेटी की रिपोर्ट को पूरी तरह लागू नहीं किया गया है, सिर्फ ड्रग विभाग अलग कर दिया गया।
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