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साहबों के फॉरेन टूर, मकसद से कोसों दूर

Kanpur

Updated Mon, 26 Nov 2012 12:00 PM IST
केस नंबर एक---
अरबन डेवलपमेंट और प्लानिंग की नई परिभाषा सीखने के लिए कानपुर के पूर्व नगर आयुक्त आर. विक्रम सिंह एक महीने अमेरिका में रहे। सरकारी टूर था। रोज अमेरिका के प्रसिद्ध स्थलों पर खिंचाई गई अपनी फोटो फेसबुक पर लोड करते थे। मिनट-मिनट का अपडेट रहता था। शहर लौटे तो न डेवलपमेंट के फ्रंट पर कुछ कर सके न प्लानिंग के। शहर वैसी ही समस्याओं से जूझ रहा है जैसी पहले थीं। अमेरिका में जो सीखा, वह फाइलों के ढेर में दबा है।
केस नंबर दो---
शहर में ही नगर आयुक्त रहे मणिकांत मिश्रा ने भी सरकारी खर्चे पर करीब एक सप्ताह अमेरिका में गुजारा। शहरी विकास से संबंधित कई सेमिनार अटेंड किये। कई अमेरिकी मेयर के सामने शहर की तस्वीर रखी। भाषण दिये। विशेषज्ञों से मुलाकातें कीं। लेकिन उनके इस टूर का शहर को कोई लाभ नहीं मिला। यहां कूड़ा-गंदगी अब भी फैला है। सीवर और नालियां वैसी ही जाम हैं।

साहबों के विदेशी दौरों का कड़वा सच यही है। इसी कड़ी में नगर आयुक्त एनकेएस चौहान भी फ्रांस का टूर करके आये हैं। उनके साथ विभिन्न जनपद के करीब दो दर्जन पीसीएस अफसर भी फ्रांस गए थे। बीते पांच वर्ष में शासन के सौजन्य से 200 से अधिक आईएएस, आईपीएस, पीसीएस और पीपीएस अफसर विदेशी दौरे कर चुके हैं। कानपुर के सीडीओ रहे नरेंद्र शंकर पाण्डेय, नगर आयुक्त रहे मणि प्रसाद मिश्रा और पीके पाण्डेय, डिप्टी एसपी रहे अरविंद मिश्रा सहित कई अफसरों ने विदेशी दौरे किये। इन अफसरों को भेजा जाता है विकसित देशों के शहरों का इंफ्रास्ट्रक्चर, प्लानिंग, टेक्नोलॉजी और वर्क कल्चर सहित अन्य बिंदुओं के बारे में जानकारी लेने के लिए। विदेशों में चल रही योजनाओं को अपने शहर के हिसाब से तैयार कर यहां लागू कराने के लिए। लेकिन इन दौरों से शहर को कुछ नहीं मिला। यह कहना गलत न होगा कि विदेशी दौरे अफसरों की मौज-मस्ती तक सीमित होकर रह गये हैं। हालांकि, अफसरों से बातचीत करने पर और ही समस्या सामने आती है। अफसरों के मुताबिक ट्रेनिंग या वर्कशॉप में हिस्सा लेने के बाद जब तक योजना बनाते हैं, तबादला कर दिया जाता है। दूसरे विभाग का सिस्टम जब तक समझते हैं, वहां से भी तबादला हो जाता है। ऐसे में ट्रेनिंग या वर्कशॉप में सीखी बातों को कहां और कैसे इंप्लीमेंट करें? यह समस्या आती है। दूसरे यूपी में इंफ्रास्ट्रक्चर भी नहीं है। ट्रैफिक लाइटें अगर लगी हैं तो स्मैकिये बैटरी चोरी कर ले जाते हैं। कोई शराबी कार की टक्कर से लाइट के खंबे गिरा देता है। यह खंबे महीनों ऐसे ही पड़े रहते हैं। ऐसे में कैसे काम होगा।

मैं दो हफ्ते की मैनेजमेंट ट्रेनिंग के लिए यूएसए के डरहम शहर की ड्यूक यूनिवर्सिटी गया था। वहां कई महत्वपूर्ण जानकारियां सीखने को मिलीं। इस ट्रेनिंग की बातें लागू इसलिए नहीं हो सकीं क्योंकि मेरा तबादला हो गया। यूपीएसआईडीसी में रहता तो काफी कुछ बेहतर करता।
वेद प्रकाश वर्मा, संयुक्त विकास आयुक्त, कानपुर

पुलिसिंग की स्टडी के लिए मैं दो सप्ताह के लिए यूके गया था। वहां जो चीजें सीखीं वह अपने शहर में लागू नहीं हो सकतीं। वहां इंफ्रास्ट्रक्चर है। टेक्नोलॉजी है। जनता अपनी जिम्मेदारियां समझती है। कंट्रोलरूम से मॉनीटरिंग होती है। कोई गड़बड़ नहीं कर सकता। ऐसा सिस्टम अपने देश में हो जाये और लोग समझदार हो जायें तो कोई समस्या न हो।
राम लाल वर्मा, एसपी ट्रैफिक, आगरा

इनसेट
ये है विदेश जाने का हवाई खर्च
एक व्यक्ति के दिल्ली से अमेरिका आने और जाने की इकोनॉमी क्लास की टिकट 68,000 से 75,000 रुपये के बीच है जबकि बिजनेस क्लास का किराया सवा तीन लाख रुपये तक है। फ्रांस आने-जाने के लिए एक व्यक्ति की इकोनॉमी क्लास की टिकट 45,000 से 50,000 रुपये की है। बिजनेस क्लास में फ्रांस आने-जाने की टिकट के लिये पौने दो लाख तक खर्च करने पड़ेंगे। ट्रैवल कंपनी संचालक शारिक अल्वी के मुताबिक एयरलाइंस कंपनी के अनुसार किराया कम या ज्यादा हो सकता है। इसके अलावा शहरों के मुताबिक भी खर्च घट-बढ़ जाता है। अगर कोई अमेरिका के सेन फ्रांसिस्को, रियो डि जेनेरो या बोस्टन जाना चाहता है तो किराया अलग-अलग होगा। इसके अलावा त्योहार या रश सीजन में भी टिकट के दाम ऊपर-नीचे होते रहते हैं।
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