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बीमार स्वास्थ्य सेवाएं निकाल रहीं दम

Kannauj

Updated Thu, 12 Jul 2012 12:00 PM IST
कन्नौज। दुआ करें कि कोई बीमार न पडे़ क्यों कि यहां की स्वास्थ्य सेवाएं बेदम हैं और मरीज बेहाल। और ऐसा तब है जब जिले को वीवीआईपी दर्जा प्रापत हैं । यहां की हवाओं तक पर मुख्यमंत्री की नजर हफिर भी इतनी लचर स्वास्थ्य सेवाएं जिसकी कल्पना ही नहीं की जा सकती। कहीं स्टाफ की कमी तो कहीं लापरवाही मरीजों पर कहर बरपाने के लिए काफी है। अफसरों की नाक के नीचे बने जिला चिकित्सालय में ही डाक्टरों के कक्षों में अक्सर कुरसियां खाली मिलती हैं, जिससे जिले के दूरस्थ इलाकों के अस्पतालों की तस्वीर खुद झलकने लगती है। सुधार का दिलासा है पर बदलाव नजर नहीं आता ।
बुधवार को जिला अस्पताल के अल्ट्रासाउंड कक्ष में ताला लटकता रहा। दर्जनों मरीज उम्मीद लेकर पहुंचे और अल्ट्रासाउंड कराने के इंतजार में खड़े रहे। बाद में बताया गया कि अल्ट्रासाउंड मशीन कई दिनों से खराब है। निजी पैथालाजी सेंटर जाओ। सीएमएस डा. हीरा सिंह के सामने समस्या रखने गए तो वहां भी ताला मिला। इस पर वे मायूस होकर लौट गए। यही हाल ओपीडी में बैठने वाले डाक्टरों का था। अधिकतर डाक्टर नदारद थे। टेबिल पर मरीजों के परचे रखे हुए थे। इंतजार खत्म नहीं हुआ मायूस मरीज लौट गए।
विनोद दीक्षित अस्पताल में अधीक्षक समेत चार डाक्टरों की तैनाती है। लेकिन मौके पर अधीक्षक ही मिले। एक्सरे रूम का ताला तो खुला था पर उसके अंदर कोई टेक्नीशियन मौजूद नहीं था। मरीज एक्सरे प्लेट लेकर तो कुछ परचे लेकर डाक्टरों को खोजने में लगे हुए थे। सभी ओपीडी कमरों की कुरसियां खाली पड़ी थीं। दो बजे तक मरीज भटकते रहे बाद में अफसरों को कोसते हुए चले गए।
उम्मीद थी कि जिले में चिकित्सकों की संख्या और संसाधन बढ़ेंगे पर हुआ उलटा। दर्जनभर से ज्यादा डाक्टर जुगाड़ फिट करके गैर जिले स्थानांतरण कराकर चले गए, जबकि कुछ को जबरिया दूसरे जनपद भेज दिया गया। उनके स्थान पर नई तैनाती की गईं, लेकिन इनमें से ज्यादातर कन्नौज आए ही नहीं। इस कारण स्टाफ की भारी किल्लत अब जनता की नाक में नकेल किए है। सर्जनों का तो अकाल सा पड़ गया है। इसमें नेत्र रोग विशेषज्ञ डा. संजय बाबू, जनरल सर्जन डा. सुनील चौरसिया, नाककान गला रोग विशेषज्ञ डा. रुद्रसेन, हड्डी रोग विशेषज्ञ डा. एसपी कटियार, ह्रदयरोग विशेषज्ञ डा.सुनील कात्याल, सर्जन डा. एसके सिंह आदि का तबादला होना मरीजों को महंगा पड़ रहा है। फोड़ा-फुंसी तक का इलाज नहीं हो पा रहा है।
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