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अभी तो किस्मत के भरोसे रहने को मजबूर हजारों किसान

Kannauj

Updated Tue, 12 Jun 2012 12:00 PM IST
कन्नौज। जिले के बीस हजार से अधिक किसान परिवारों की निगाहें मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ टिकी हैं। उनका असली कल्याण तभी होगा जब जिले में आलू आधारित कोई फैक्ट्री लगेगी। दो दशक से देखा जा रहा यह सपना कब पूरा होगा।
कन्नौज में चाहे जो चुनाव हो, प्रत्याशियों की किस्मत का दरवाजा आलू किसानों की चौखट पर जाकर ही खुलता है। करीब 30 से 35 हजार किसान परिवार आलू की फसल बोते हैं। यही यहां की मुख्य फसल है। आलू के भावों में अजीबोगरीब अंदाज में उतार-चढ़ाव चलता रहता है। कभी 10 से 15 रुपये किलो बिकता है तो कभी सड़कों किनारे सड़ने के लिए फेंका जाता है। आलू किसान अभिलाष मिश्रा कहते हैं कि यदि फैक्ट्री लग जाए तो उसमें जिस गुणवत्ता की मांग होगी उस क्वालिटी का आलू किसान पैदा करने लगेंगे। आलू बोना किसानों की आदत बन चुकी है क्योंकि मौसम व जलवायु इसके लिए अनुकूल है। फैक्ट्री लगने से आलू की खपत बढ़ जाएगी, जिससे फेंकने या सड़ने की नौबत नहीं आने पाएगी। शीतगृह एसोसिएशन के पूर्व जिलाध्यक्ष गिरीश चंद्र दुबे कहते हैं कि यूपी में सर्वाधिक 98 शीतगृृह कन्नौज में बन चुके हैं। कुछ शीतगृह निर्माणाधीन हैं। आलू को भंडारित करके सुरक्षित रखने के लिए पर्याप्त इंतजाम हैं लेकिन खपत का जरिया न होने की वजह से किसानों को वाजिब दाम नहीं मिलता। यदि मुख्यमंत्री चाह लेंगे तो आलू आधारित उद्योग का सपना साकार हो जाएगा।
सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने भी 1999 के चुनाव के दौरान कन्नौज में आलू पर आधारित उद्योग लगाने का वायदा किया था। बाद में यहां की सियासी कमान संभालने वाले अखिलेश यादव ने भी इस वादे को दुहराया। पिछली सपा सरकार के कार्यकाल में अखिलेश यादव ने आलू उद्योग की स्थापना के लिए प्रयास किए, लेकिन कोशिशें मंजिल तक नहीं पहुंच पाई थीं। बाद में बसपा सरकार बनने पर मामला फिर दब गया। पुन: सपा की सरकार बनने, तीन बार सांसद रहे अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने और अब उनकी पत्नी डिंपल यादव के निर्विरोध सांसद बनने के बाद किसानों को उम्मीदें हिलोरे मार रही हैं।
आलू किसानों के दर्द का जड़ से इलाज करने के लिए मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सक्रिय हैं। सपा नेता जय कुमार तिवारी की माने तो छिबरामऊ, कन्नौज और तिर्वा तीनों ही तहसील क्षेत्रों के किसान आलू से जुड़े हैं। क्षेत्र में जाने पर किसान लगातार आलू पर आधारित उद्योग लगवाने की मांग भी करते हैं। किसानों की समस्या को पार्टी भलीभांति जानती है और समाधान के लिए कोशिशें हो रही हैं। 5 जून को कलेक्ट्रेट में डिंपल यादव के नामांकन के बाद मीडिया से बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा भी था कि आलू किसानों के लिए वे चिंतित हैं। जल्द ही आलू किसानों के लिए कुछ न कुछ अवश्य किया जाएगा।
इत्र उद्योग के लिए देश और दुनिया में मशहूर कन्नौज में आलू आधारित फैक्ट्री लगवाने की राह आसान नहीं है। सूत्रों की मानें तो लखनऊ स्तर पर तमाम उद्यमियों से बात की गई पर वे कन्नौज में निवेश को तैयार नहीं हुए। इसकी मुख्य वजह आलू की गुणवत्ता अनुकूल न होना बताया जा रहा है। किसानों की माने तो मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यदि ठान लिया है तो वे आलू आधारित फैक्ट्री लगवाकर ही रहेंगे। इससे पहले भी उन्होंने मेडिकल कालेज, बाईपास, नदियों पर पुल बनवाने जैसे बड़े काम कर वायदे पूरे किए हैं।
ॎ उद्यान विभाग के आंकड़ों की माने तो बिहार, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ समेत विभिन्न प्रांतों की मंडियों में कन्नौज का आलू बिकने जाता है। पेप्सिको समेत कई ब्रांडेड कंपनियों ने तो चिप्स बनाने के लिए भी यहां के आलू की खरीद शुरू की है। इससे यह बात गलत साबित हो गई है कि कन्नौज के आलू की गुणवत्ता खराब है।
विधानसभा चुनाव में आलू की दुर्गति पर खूब हल्ला मचा था। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गांधी को छिबरामऊ से कन्नौज आते वक्त किसानों ने रास्ते में रोका था। सड़क किनारे ले जाकर सड़ते आलू को दिखाया था। तब कन्नौज व तिर्वा की जनसभा में आलू किसानों के दर्द को राहुल ने उठाया था, जिसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने सुर्खियों में लिया था।
- जिले में अभी तक रैक प्वाइंट नहीं बन सका है। इस कारण फर्रुखाबाद में खाद स्टोरेज होती है। वहां से आने में वक्त लगता है। नतीजतन जरूरत के वक्त किसान यूरिया-डीएपी के लिए भटकते हैं।
- गुरसहायगंज से गंगा कटरी क्षेत्र जुड़ा है। वहां मंडी समिति अभी तक नहीं बनी है। इस कारण किसानों को 22 से 25 किमी दूर छिबरामऊ या कन्नौज जिला मुख्यालय की दौड़ लगानी पड़ती है।
- तिर्वा, अहेर, मानीमऊ समेत दूरस्थ क्षेत्रों में फल मंडी बनाने के प्रस्ताव मंडी प्रशासन की लापरवाही के कारण लटके हैं। फल उगाने वाले किसानों को बिक्री के लिए प्वाइंट न मिलने से वाजिब दाम नहीं मिलता है।
- कन्नौज व छिबरामऊ में बने लाखों रुपये कीमत के इलेक्ट्रानिक धर्मकांटे चालू नहीं किए जा रहे जिस कारण किसानों के घटतौली का शिकार होने का सिलसिला जारी है।
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