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साक्षर बनाने तक सीमित है शिक्षा व्यवस्था : डा. श्याम

Jhansi

Updated Wed, 28 Nov 2012 12:00 PM IST
झांसी। राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (नैक) के डिप्टी एडवाइजर डा. श्याम सुंदर ने कहा कि आजादी मिलने के बाद देश में शिक्षा प्रणाली में किसी प्रकार का कोई परिवर्तन नहीं किया गया। अंग्रेजों द्वारा थोपी बाबूगीरी को बढ़ावा देने वाली शिक्षा है। यह लोगों को साक्षर बनाने से ज्यादा कुछ नहीं करती। वह मंगलवार को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय इंटरनल क्वालिटी एश्योरेंस सेल द्वारा शिक्षा बनाम परीक्षा विषय पर परिसर स्थित आयोजित सेमिनार में विचार व्यक्त कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन की जरूरत है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जिससे युवा राष्ट्र के विकास में अहम भागीदारी कर सकें। वह इस योग्य बने कि न केवल खुद के लिए रोजगार सृजित करें, बल्कि दूसरों को भी रोजगार मुहैया करा सकें। उन्होंने कहा कि प्राइमरी से लेकर उच्चशिक्षा तक सृजनशीलता की कमी है। शिक्षा में सुधार के बाद ही परीक्षा व्यवस्था में सुधार संभव है। इसमें विद्यार्थी तोते की तरह रटते हैं और बाद में परीक्षा देते हैं। जो जितना ज्यादा रटता है, वह उतने अच्छे नंबरों से पास होता है। इस व्यवस्था से पैदा शिक्षित वर्ग आदेशों के पालन तक ही सीमित रह जाता है।
इससे पहले सेमिनार का शुभारंभ करते हुए कुलपति प्रो. सुरेश वीर सिंह राणा ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की गुंजाइश है। परिवर्तन के बिना किसी भी व्यवस्था में सुधार संभव नहीं है।
सैम हिगेंस बाटम इंस्टीट्यूट आफ एग्रीकल्चर एंड टेक्नोलॉजी, इलाहाबाद के शिक्षा विभाग की हेड प्रो. मरियम मैथ्यू ने कहा कि शिक्षकों का बड़ा वर्ग ज्ञान के नए स्रोत व तकनीक से दूर है। वह लाइब्रेरी नहीं जाते। इतना ही नहीं कक्षा में जाने से पहले वह पाठ को लेकर कोई प्लानिंग नहीं करते हैं।
प्रति कुलपति प्रो. पंकज अत्रि ने मूल्यांकन सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कहा कि परीक्षकों को 8 घंटे में 100 कापियां जांचनी होती हैं। शिक्षक चाय पीते व बात करते मूल्यांकन करते हैं। मूल्यांकन के लिए कोई समय सीमा निर्धारित ही नहीं होनी चाहिए। तभी ठीक तरीके से मूल्यांकन हो सकेगा।
आईक्यूएसी सेल की इंचार्ज डा. यशोधरा शर्मा ने कहा कि शिक्षित वर्ग भी बेरोजगारी का शिकार है। यह इस और इशारा करता है कि हमारी शिक्षा प्रणाली में कोई कमी है। शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी विद्यार्थी स्वावलंबी नहीं हो पाते हैं, उनके भौतिक व आध्यात्मिक प्रगति शून्य रहती है।
इस अवसर पर संजय सेंगर, सतीश साहनी, बृजेंद्र शुक्ला, प्रो. आर के सक्सेना आदि उपस्थित रहे।
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