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धराशाई हो गया ऐतिहासिक दतिया द्वार

Jhansi

Updated Tue, 28 Aug 2012 12:00 PM IST
झांसी। मराठा शासकों द्वारा निर्मित तकरीबन दो सौ साल साल पुराना ऐतिहासिक दतिया द्वार धराशाई हो गया। सोमवार की सुबह हुई मूसलाधार बारिश के दौरान दरवाजे का एक हिस्सा भरभरा कर गिर गया, जिससे आवागमन ठप पड़ गया। गनीमत रही कि उस समय सड़क खाली थी, अन्यथा बड़ा हादसा हो सकता था।
सोमवार की सुबह करीब साढ़े पांच बजे जब लोग बिस्तर छोड़ने की तैयारी कर रहे थे, अचानक मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। करीब साढ़े छह बजे दतिया द्वार का एक हिस्सा गिर गया। इसकी आवाज इतनी तेज थी कि आस पास के लोग डर गए और घराें से बाहर निकल आए। कुछ ही देर में वहां भीड़ इकट्ठी हो गई। दरवाजे की मिट्टी और पत्थर गिरने से बड़ा बाजार, मुहल्ला अलीगोल और नारायण कालोनी की ओर जाने वाले रास्ते अवरुद्ध हो गए। गनीमत रही कि तेज बरसात के कारण उस समय सड़क सुनसान थी, जिससे कोई अनहोनी नहीं हुई। करीब सवा सात बजे पानी बंद होने के बाद मामले की खबर प्रशासनिक अधिकारियों को दी गई। कुछ देर बाद नगर मजिस्ट्रेट पी के श्रीवास्तव मौके पर पहुंचे। उन्होंने मौका मुआयना किया। हालातों को देखते हुए आसपास पुलिस तैनात कर दी गई, ताकि लोग क्षतिग्रस्त दरवाजे के आसपास भीड़ न लगाएं। बाद में जेसीबी व ट्रैक्टर लेकर नगर निगम की पूरी टीम मौके पर पहुंची और मलबा हटाने का काम शुरू किया।
बताते चलें कि मराठा काल में झांसी शहर की सुरक्षा के लिए चारों ओर परकोटा बनाया गया था। विभिन्न दिशाओं में आवागमन के लिए इस परकोटे में दस दरवाजे बनाए गए थे। दतिया की ओर जाने वाले मार्ग पर बना दरवाजा दतिया द्वार के नाम से जाना जाता है। दरवाजे की देखरेख न होने के कारण उस पर घास उग आई थी। नीचे से निकली पाइप लाइनों में लीकेज के कारण दरवाजे का काफी हिस्सा पानी में बह गया था। नारायण कालोनी की ओर जाने वाली गली के तरफ की दीवार में दो फुट चौड़ी दरार हो गई थी। मुहल्ले वालों ने इसको लेकर प्रशासन को ज्ञापन देकर दरवाजे की मरम्मत कराने की भी मांग की थी, लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया। ‘अमर उजाला’ ने 27 अगस्त के अंक में दरवाजे की दुर्दशा को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। प्रशासन इस दिशा कोई कदम उठाता उसके पहले ही ऐतिहासिक धरोहर मिट्टी में मिल गई।

रानी लक्ष्मीबाई के ससुर ने बनवाया था परकोटा
झांसी। सन् 1741 में झांसी के दुर्ग पर प्रथम मराठा सूबेदार नारोशंकर ने आधिपत्य जमाया था। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई के ससुर शिवराव हरी ने वर्ष 1794 से 98 के बीच परकोटा बनवाया था। इसी दौरान यह दरवाजा बनवाया गया था।

और दरवाजे भी हो सकते हैं जमींदोज
झांसी। वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की गौरव गाथा का साक्षी ऐतिहासिक किला और उससे जुड़ा वृहद् परकोटा झांसी की शान का प्रतीक माना जाता है। लेकिन, संरक्षण के अभाव में परकोटा लगातार काल के गाल में समाता जा रहा है। जगह - जगह अवैध कब्जों की वजह से इसका स्वरूप तो पहले से ही छिन्न - भिन्न हो गया है और अब बीच- बीच में बने गेट भी साथ छोड़ने को हैं। बावजूद, इस ओर किसी का ध्यान नहीं है।
ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण झांसी के दुर्ग का निर्माण सन 1613 ई. में ओरछा नरेश वीर सिंह देव ने कराया था। सन् 1742 में यह किला मराठा सूबेदार नारोशंकर के आधिपत्य में आ गया था। इसी काल में रानी लक्ष्मीबाई के ससुर शिव राव हरी ने सन 1794 - 98 में परकोटे का निर्माण कराया था। किले से जुड़े इस परकोटे के भीतर समूचा झांसी नगर बसता था। इसकी बनावट सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। परकोटे में खास ढंग से जगह - जगह छिद्र बनाए गए थे, जिनसे भीतर की ओर से बाहरी शत्रु को देखकर गोले दागे जा सकते हैं, परंतु बाहर से शत्रु द्वारा दागे गए गोले इन छिद्रों से अंदर नहीं आ सकते। यही वजह है कि सन 1857 में अंग्रेजों से हुए युद्ध में इस परकोटे ने कवच का काम किया था। अंग्रेजों की तोपों से निकले सैकड़ों बारूदी गोलों को इस परकोटे ने अपने फौलादी सीने पर झेला था, लेकिन अपनों के वार से यह अपने को नहीं बचा पाया। जी हां, परकोटा लगातार अपना मूलस्वरूप खोता जा रहा है। यह बुरी तरह से कब्जों की चपेट में है। कई स्थानों पर तो इसे खोजना भी मुश्किल हो जाता है। वहीं, गेटों की हालत भी ठीक नहीं है। सोमवार की सुबह हुई मूसलाधार बारिश में ऐतिहासिक दतिया गेट तो जमींदोज हो चुका है, परंतु संरक्षण के अभाव में अन्य दरवाजों की स्थिति भी ठीक नहीं है। चांद गेट खतरनाक स्थिति में पहुंच चुका है। व्यस्ततम मार्ग पर बने सैंयर गेट की भी स्थिति भी इससे जुदा नहीं है। गनपत खिड़की से पत्थर आए दिन झड़ते रहते हैं। उन्नाव गेट भी जीर्णशीर्ण अवस्था में है। कमोबेश अन्य सभी दरवाजे उन्नाव गेट, बड़ागांव गेट, सागर गेट, ओरछा गेट, चांद गेट, झरना गेट व भांडेरी तथा खिड़कियां गनपत खिड़की, भैरो खिड़की, सूजे खां खिड़की व बिलैया खिड़की खतरनाक स्थिति में हैं, जो कभी भी हादसे का सबब बन सकती हैं।

आखिर किसकी है जिम्मेदारी?
झांसी। किले को केंद्रीय पुरातत्व विभाग ने संरक्षण में ले रखा है, परंतु परकोटा लावारिस स्थिति में है। न तो यह राज्य इकाई के पास है, और न ही नगर निगम या झांसी विकास प्राधिकरण। यही वजह है कि परकोटे पर लगातार कब्जे बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन इन्हें रोकने वाला कोई नहीं। पुरातत्व अधिकारी एस के दुबे का कहना है कि नगर में नगर निगम टैक्स वसूलता है, कायदे से परकोटे के रखरखाव की जिम्मेदारी भी नगर निगम को लेनी चाहिए। उनका कहना है कि संरक्षित पुरा इमारत के 100 मीटर की परिधि में नवीन निर्माण पर रोक है, जबकि परकोटा शहर की घनी आबादी के बीच से निकला है। ऐसे में इसे संरक्षण में लेना तकनीकी दृष्टि से संभव नहीं होगा।


‘परकोटे में बने अन्य सभी दरवाजों व खिड़कियों का सर्वेक्षण कराया जाएगा। कमजोर स्थिति पाए जाने पर सुधार के लिए कदम उठाए जाएंगे।’
- गौरव दयाल, जिलाधिकारी
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