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तीन सौ साल पुराना है कोंच का गणेशोत्सव

Jalaun

Updated Sun, 23 Sep 2012 12:00 PM IST
कोंच(जालौन)। कोंच का गणेशोत्सव लगभग तीन शताब्दी पुराना है और बाजीराव पेशवा प्रथम ने अपनी प्रेयसी मस्तानी की याद में इसकी नींव डाली थी। 1730 ई. में प्रारंभ हुआ गणेशोत्सव आज भले ही अपनी प्रादुर्भाव काल की आभा से आच्छादित न हो लेकिन यहां के धर्मानुरागियों और विभिन्न गणेश मंडलों द्वारा इसे जीवंत बनाये रखने का प्रयास लगातार जारी है।
बाजीराव पेशवा ने इसे आमजन का आयोजन बनाने के लिये गणेशोत्सव में गणिकाओं के नृत्य की परंपरा डाली थी जो कालांतर में सामाजिक विद्रूपताओं के चलते समाप्त हो गई है और अब अन्य धार्मिक आयोजनों को इसके साथ जोड़ दिया गया है। इस गणेशोत्सव पर मराठा प्रभाव दिखता है, लगभग तीन शताब्दी पूर्व बाजीराव पेशवा प्रथम ने अपनी प्रियतमा मस्तानी के प्रति अपने अगाध प्रेम को जीवंत बनाये रखने के लिये 1730 ईसवी में कोंच में गणेशोत्सव की शुरुआत की थी। तब कोंच में तकरीबन दो सैकड़ा गणिकायें रात भर नृत्य कर लोगों का मनोरंजन करती थी। नृत्य परंपरा विगत साढे़ तीन दशक पूर्व तक जारी भी रही किंतु अराजकता के कारण समाप्त हो गई है।
बताते हैं कि ब्रिटिश हुकूमत के दौरान आजादी के संघर्ष में आम जनजीवन की सक्रिय सहभागिता के उद्देश्य से महाराष्ट्र में स्वाधीनता आंदोलन के महानायक बाल गंगाधर तिलक ने गणेशोत्सव की परंपरा डाली थी। इस उत्सव पर मराठा प्रभाव दिखता है। महाराष्ट्र का आज भी प्रमुख पर्व गणेशोत्सव ही है।
वर्ष1727 ई. में तत्कालीन महाराज छत्रसाल ने बाजीराव पेशवा (प्रथम) को उनका हिस्सा हस्तांतरित करने का वचन दिया था। सन् 1730 में पेशवा को जो हिस्सा हस्तांतरित किया गया उसमें कोंच भी सम्मिलित था। यहां के जानेमाने पुरातत्व वेत्ता डा. जेपी गुप्ता बताते हैं कि 1730 से ही कोंच में गणेशोत्सव शुरू हुआ था। भाद्र कृष्ण पक्ष के अंतिम दिनों में गणेशोत्सव की तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं और भाद्र शुक्ल चतुर्थी को विघ्नहर्ता एकदंत का धूमधाम से प्राकट्य होता है। इसके साथ ही सप्ताह भर बिभिन्न धार्मिक सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं। बुजुर्ग बताते हैं कि जब गणेशोत्सव चरम पर था तब सैकड़ा भर स्थानों पर लम्बोदर की प्रतिमायें प्रतिष्ठापित की जाती थीं । बनारस, शिवपुरी, मुरैना आदि जगहों से गणिकायें आकर गणेश प्रतिष्ठापना स्थलों पर नृत्य कर पारितोषक प्राप्त करती थीं। उस दौरान पूरे नगर में रात भर उत्सव जैसा माहौल रहता था।
तहसील के निकट प्राचीन गढ़ी पर स्थित गणेश मंदिर में नृत्य विनायक की अद्भुत प्रतिमा के अलावा बड़ी माता मंदिर और लक्ष्मीनारायण मंदिर (बड़ा मंदिर)में भी स्थापित गणेश प्रतिमायें प्रतिष्ठित हैं। गढ़ी पर स्थापित भगवान एकदंत की नृत्यरत प्रतिमा के बाबत बताया गया है कि इसका शिल्पांकन नौवीं शताब्दी में चंदेल नरेशों द्वारा कराया गया था। मूर्ति शास्त्र के अनुसार यह मुद्रा गणेश की सबसे लोकप्रिय मुद्रा है, लाल बलुए पाषाण से निर्मित इस विग्रह की कलात्मकता देखते ही बनती है। गणपति की यह प्रतिमा सुख, आनंद, कीर्ति व कला में सफलता प्रदान करने बाली है। कोंच की ऐतिहासिक गणेशोत्सव की परंपरा को कभी भी सरकारी संरक्षण प्रदान करने का किसी भी स्तर से प्रयास नहीं किया गया अन्यथा महोबा के कजली महोत्सव और मऊरानीपुर के जलविहार की तरह कोंच का गणेशोत्सव भी पूरी आभा के साथ मनाया जा रहा होता।
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