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जिले के हथकरघा उद्योग को लगा घुन

Jalaun

Updated Mon, 17 Sep 2012 12:00 PM IST
माधौगढ़ (जालौन)। कभी क्रांति वीरों की पसंद रहे हथकरघा से बुने सूती वस्त्र आज आधुनिकता की चकाचौंध में खो गया। नतीजतन आज पेशे से जुड़े हजारों बुनकर परिवार रोजी रोटी की समस्या से परेशान हैं। उधर, शासन स्तर से भी बुनकरों के लिए कोई ठोस कार्य योजना न बनाए जाने से हथकरघा उद्योग लगभग ठप सा है।
सूती वस्त्रों के लिए माधौगढ़ बाजार की अपनी अलग ही साख थी। क्षेत्र के तकरीबन पचास गांवों में हथकरघा उद्योग चरम पर था। अस्सी के दशक तक ज्यादातर कोरी परिवारों की रोजी रोटी सूती कपड़ों की बुनाई पर ही टिक था। आज हालात एकदम उलट हैं।
क्षेत्र के बुनकर सेवाराम कहते हैं कि हथकरघा कार्य करते करते चौथी पीढ़ी है। तहसील क्षेत्र के गांव नावली, धमना, सुरावली, माधौगढ़, कुरसेड़ा, धमरेही, सिहारी, पृथ्वीपुरा, पिचौरा, झरैला, रामपुरा, गोहन में घर-घर यह काम होता था। सुबह से रात तक धुनाई, बुनाई की जाती थी। जिससे रजाई, चादर, पल्ली, खेस, साफी, नेकर, कुर्ता आदि बनाए जाते थे। सन 1960 के दशक में खेती बाड़ी बैलों से होने पर पल्ली, खेस की मांग ज्यादा रहती थी। पल्ली तो सादी विवाह में बिछाने के काम आती थी। उस समय सूती रजाई की बिक्री जोरों पर थी। रात-दिन काम करने के बाद भी माल दे पाना कठिन था। 65 वर्षीय रामकली अपना हथकरघा दिखाते हुए बताती हैं कि पति के साथ कार्य करवाने के बाद भी मांग की पूर्ति नहीं हो पाती थी। मांग अधिक होने पर जालौन, कानपुर से सूत की गांठे न आने पर जालौन जाकर ब्लैक में खरीदनी पड़ती थी। ग्रामीणों का कहना है माधौगढ़ में बाजार वाले दिन (मंगलवार- शनिवार) सूती कपड़े लेने व्यापारी भिंड, मछंड, उरई, औरैया, इटावा से आते थे। जिससे अच्छी आमदनी हो जाती थी। आज भी सैकड़ों कोरी परिवार के लोग साइकिल पर गांव गांव कपड़े बेचने का कार्य कर रहे हैं। बुनकर कामता, बृजभान, हुब्बे का कहना है कि कुटीर उद्योग की ओर शासन ने गौर नहीं किया, वहीं हैंडलूम की मशीनें स्थापित हो जाने से हम लोगों की दशा खराब हो गई है। ग्रामीण सेवा अजुद्दी का कहना है कि इस समय हथकरघा मशीन लोगों के घरों में रखी जंग खा रहीं हैं। परिवार को लोग दूसरा रोजगार अपना चुके हैं। उधर, हथकरघा विभाग के औद्योगिक पर्यवेक्षक सराफत खां ने बताया कि जिले के 116 बुनकरों को राज्य सरकार की योजना के तहत बैंक की मदद से कार्य बनाए गए हैं। जिनमें छह बुनकरों को डेढ़ लाख रुपए का तथा सौ बुनकरों का एक एक लाख रुपए का कर्ज सस्ते दर पर मिलेगा। जिससे हथकरघा उद्योग के दोबारा चलने की उम्मीद है।
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