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प्रतिभाओं को निखारना ही जीवन का उद्देश्य

Jalaun

Updated Mon, 10 Sep 2012 12:00 PM IST
उरई (जालौन)। शिक्षा के क्षेत्र में प्रतिभाओं को निखारने के लिए भारी भरकम बजट के साथ सरकारी प्रयास भले ही सफल न हो रहे हों, लेकिन समाज में आज भी ऐसी विभूतियां मौजूद हैं जो अपने एकल प्रयास से ऐसी प्रतिभाओं को तराशने में लगे हैं। प्रसिद्ध पिंगल शास्त्री व वरिष्ठ साहित्यकार माया हरीश्याम पारथ ऐसे ही विभूतियों में एक हैं। पिछले 61 वर्षों से साहित्य साधना में लगे साहित्यकार माया हरीश्याम पारथ आज भी कर्म पथ पर नौजवानों से अधिक ऊर्जावान हैं। 78 वर्षीय माया हरीश्याम मुहल्ला सुशील नगर स्थित अपने घर पर गुरुकुल सरीखे माहौल में मेधावी छात्र-छात्राओं को संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी भाषा की शिक्षा देते देखे जा सकते हैं। प्रतिदिन दोपहर व शाम को घर पर कवि कवयित्री , गीतकार, शायर उनसे राय लेते दिखाई पड़ जाते हैं।
हरीश्याम पारथ की एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकीं हैं जबकि 42 से अधिक पांडुलिपियों का प्रकाशन शीघ्र होना है। अपने छंद माया पुस्तक में उन्होंने दस नए वर्णिक व तमाम मात्रिक छंद हिंदी साहित्य को दिए हैं। इनके सृजन के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि छंद शास्त्री केशव दास कवि प्रिया चिंतमणि, कवि कुल, कल्पतरु, काव्य प्रकाश, सोमनाथ की रसपीयूष आदि का तीन दशकों तक गहरा अध्ययन किया। इसके बाद उन्होंने यह नीचोड़ा निकला कि अभी तक किसी भी छंद शास्त्री ने नया छंद सिद्ध करने के लिए विधि नहीं बताई है। इसलिए उन्होंने अपनी छंद शास्त्र की कई पुस्तक छंद माया में नए छंद में सिद्ध करने की विधि भी विस्तार से बताई है।
पारथ ने बताया कि बताया कि वह अब तक दस नए वर्णिक व कई मात्रिक छंदों की रचना कर चुके हैं। उनकी छंद माया पुस्तक में है। उन्होंने बताया कि भागीरथ पुष्पपारथी प्रयागो कृपण, गोकर्ण, शशिदुर्गा, जानकी, ब्रजवासी, रामसुंदर, नवल सहित दस नए छंदों का उन्होंने सृजन किया है। छंद माला पुस्तक में इसी तरह के मात्रिक छंदों में मात्राओं की गणना होती है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि जब वह 16 वर्ष के थे। तब पहली बार गीत लिखा। तब से आज वह 78 वर्ष के हो गए है। पिछले 61 वर्ष में ऐसा कोई दिन नहीं बीता जब उन्होंने साहित्य की किसी भी किसी विधा में कुछ लिखा न हो। श्री हरीश्याम पारथ ने बताया कि बचपन से उन्होेंने अभाव व संघर्ष झेला है। मुश्किल से अच्छे अंक में वर्ष 1951 में पास किया गया इसके बाद टुकड़ोें टुकड़ोें में पढ़ाई हुई। 67 में इंटर, बीए 70, 72 में बीए संगीत में डिप्लोमा किया है। पांच पेंशनेंबिल पोस्टें छोड़ी। प्राइवेट बीस नौकरी छोड़ी लेकिन साहित्य का साथ कभी नहीं छोड़ी। इसमें धर्मपत्नी माया व पूरे परिवार का साथ हमेशा साथ रहा।

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