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उत्तराखंड जैसी सुविधाएं उद्योगपतियों को सरकार दे

Jalaun

Updated Sun, 19 Aug 2012 12:00 PM IST
बुंदेलखंड के उद्यमियों को कहना है कि सरकारी नीतियों में कोई कमी नहीं है। न तो पहले दिए गए पैकेजों में और न नई घोषणाओं में। लेकिन जिनके ऊपर नीतियों के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी है, वह रुचि नहीं लेते। उद्योगों के लिए आधारभूत सुविधाएं बिजली, सड़क, सुरक्षा, कच्चा माल यदि उपलब्ध करा दिया जाए तो कोई कारण नहीं है कि बुंदेलखंड नोएडा, कानपुर जैसे औद्योगिक शहरों के बराबर न खड़ा हो सके। उद्यमियों का सुझाव है कि गुजरात की भांति सिंगल विंडो सिस्टम को प्रभावी बनाया जाए और तय समय सीमा में उद्यमी की अपेक्षित जरूरतें पूरी कर दी जाएं।
उरई (जालौन)। बुंदेलखंड में उद्योग न पनप पाने के पीछे बिजली की किल्लत मुख्य कारण है। सड़क, पानी आदि की व्यवस्था भी ठीक नहीं है। इन सब की व्यवस्था कर दी जाए तो बुंदेलखंड भी उत्तराखंड के माफिक तरक्की कर सकता है।
प्रसिद्ध उद्योगपति एवं जिला उद्योग संघ के अध्यक्ष रहे विशंभर नाथ गुप्ता, उद्योगपति प्रदीप निगोतिया, हरीकृष्ण गुप्ता तथा उद्योग व्यापार प्रतिनिधि मंडल के प्रदेश महामंत्री डा. दिलीप सेठ का कहना है कि उद्योगों को चलाने के लिए प्रदेश सरकार पहले बुंदेलखंड में माहौल पैदा करे। वर्ष 1984 में बुंदेलखंड में उद्योग लगानेे के लिए बिजली में 50 प्रतिशत छूट मिलने के कारण 40 नई इस्पात की फैक्ट्रियां लगी थी। लेकिन मायावती के शासन के दौरान वर्ष 1993 में यह सुविधा समाप्त करने के बाद इस्पात उद्योग फैक्ट्रियां धीरे धीरे खत्म होती चली गई। उद्योगपतियों का मानना है कि शासन सबसे पहले बुंदेलखंड में उद्योग लगाने का माहौल पैदा करे। इसके अलावा उत्तराखंड और हिमांचल प्रदेश जैसी सुविधाएं दें। उत्तराखंड राज्य में नए उद्योग लगाने वाले बिजली, व्यापार कर, इनकम टैक्स में छूट देने की घोषणा की थी।



इनसेट
वर्ष 1980 में 25 प्रतिशत अनुदान मिला था
उरई। उर्वशी सेंथेटिक्स वर्ष 90 प्रोसेसिक फैक्ट्री के मालिक उद्योगपति वीएन गुप्ता एवं रामश्री आटा मैदा मिल के मालिक प्रदीप निगोतिया का कहना है कि 1980 में केंद्र सरकार बुंदेलखंड में नया उद्योग लगाने के लिए कुल कैपिटल का 25 प्रतिशत अनुदान देती थी। साथ ही सेल्स टैक्स और 6 वर्ष की छूट दी गई थी। राज्य सरकार ने बीडीआर बुंदेलखंड डेवलपमेंट रिपेक्ट के तहत 50 प्रतिशत की छूट प्रत्येक उद्योगपति को दी थी। जबकि उत्तराखंड में उपरोक्त छूट के साथ इनकम टैक्स तथा एक्साइज टैक्स में भी 6-7 वर्षों की छूट उद्योगपतियों को दी गई है।


इनसेट

उद्योगों के लिए बने एकल खिड़की
उरई। उद्योगपति विशंभर नाथ गुप्ता, प्रदीप निगोतिया, हरीकृष्ण सेठ, डा.दिलीप सेठ का कहना है कि जो उद्योगपति बुंदेलखंड में कारखाना लगाने आता है वह लाल फीता शाही में ही जकड़ कर रह जाता है जिससे उसका उद्योग लगाने का उत्साह ही खत्म हो जाता है।


जिम्मेदारों में इच्छाशक्ति नहीं
चित्रकूट। जिले के उद्यमियों का कहना है कि सरकारें नीतियां तो बढ़िया बनाती है लेकिन इन नीतियाें को क्रियान्वित करने का जिम्मा जिनके पास होता है उन्हें न तो नीति निर्माताओं की भावनाओं से कोई सरोकार है और न ही जनता को लाभान्वित करने की इच्छा। जिले के एकमात्र केशर उद्योग की यूनियन के अध्यक्ष ध्यान सिंह सिसौदिया ने बताया कि अगर बिजलीअनवरत मिले तो उद्योग खूब पनपे। उन्होंने बताया कि लोगों ने खादी ग्रामोद्योग के माध्यम से लोन के लिए अप्लाई किया था लेकिन काफी लोगों को लोन ही नहीं मिल सका। कहा कि अगर सरकार आसान लोन की प्रक्रिया अपनाए तो सरकार को केवल इसी उद्योग से मिलने वाला राजस्व दूना हो जाए और लोगों को भी रोजगार मिले। उनका कहना है कि सरकार नीतियां तय करते समय क्षेत्र के उद्यमियों से एक बार भी बात करना उचित नहीं समझती, सलाह लेना तो दूर की बात है। भरतकूप में स्टोन क्रेशिंग कंपनी के मालिक सत्य प्रकाश द्विवेदी ने कहा कि अगर सरकार योजनाओं की घोषणा करने के बजाय सरकारी मशीनरी को दुरुस्त कर सके तो उद्योग धंधों का विकास हो जाएगा। बुंदेलखंड में उद्योगों का जाल बिछ जाए
जिले में तेंदू पत्ते के ठेकेदार कमलेश कुमार मिश्रा का कहना है कि कांगेस सरकार में राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्व काल में बुंदेलखंड को उद्योग जोन घोषित किया था लेकिन क्षेत्र में अराजकता और डकैतों के कारण उद्योगपति नहीं आना चाहते। कानून व्यवस्था को दुरुस्त करना चाहिए।

गुजरात की तरह हो व्यवस्था
उद्यमियों का कहना है कि हमारे प्रदेश में सिंगल विंडो व्यवस्था न होना सबसे बड़ी दिक्कत है। सत्यप्रकाश द्विवेदी ने बताया कि गुजरात में अगर उद्योगपति निवेश करना चाहता है तो वह जिलाधिकारी से मिलता है। डीएम उस उद्योग से जुड़े सभी विभागों के अधिकारियों की मीटिंग कर यह निर्देश जारी कर देता है कि दो सप्ताह के भीतर सभी कागजात पूरे करे। इस पर सभी काम करते है और दो सप्ताह से एक माह में ही बडे़ उद्योगों केे लाइसेंस जारी हो जाते हैं।

बुंदेलखंड में औद्योगीकरण सफल न रहने के कुछ बिंदु
1. क्षेत्र में विद्युत आपूर्ति का बेहद बुरा हाल
2. क्षेत्र में अराजकता के हालात होने से निवेशक यहा निवेश करना पसंद नहीं करते
3. लाइसेंस राज से परेशान है क्षेत्र के उद्यमी
4. सरकारी नीतियों में नही ली जाती उद्यमियों की राय

उद्योगों के नाम पर सिर्फ हुआ छलावा
हमीरपुर। बुंदेलखंड में उद्योगों के नाम पर अभी तक जिले को कोई पैकेज नहीं मिला है। बल्कि जो योजनाएं जिले में संचालित थी। उन्हें बंदकर दिया गया है। अगर उद्योगों को बढ़ावा देना है तो पिछली संचालित योजनाओं को फिर से चालू किया जाए।
बुंदेलखंड में बिजली पर सब्सिडी दी जाती थी। लेकिन यह सब्सिडी जब से बंद हो गई तो बुंदेलखंड में उद्योगों का लगना बंद हो गया। साथ ही पुराने उद्यमी भी इस क्षेत्र से अपने उद्योग बंद कर दिए। कुरारा ब्लाक के विद्यादेवी ग्रामीण विकास संस्थान के महामंत्री राकेश कुमार का कहना है कि जिले में खाद्य प्रसंस्करण से संबंधित उद्योग फल फू ल सकते है। लेकिन सरकार को इन उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए आधार भूत ढंाचा तैयार करना पड़ेगा। क्योंकि बिजली कटौती, खराब सड़कें, कुशल कारीगर सहित अन्य समस्याओं के चलते उद्योगों में रूकावट आती हैं।

वीरान पड़ा है भूरागढ़ औद्योगिक क्षेत्र
अमर उजाला ब्यूरो
18 अगस्त
बांदा। बुंदेलखंड में उद्योग लगाने के लिए शासन द्वारा समय-समय पर लागू की गईं रियायती भरी योजनाओं के बावजूद जिले में औद्योगिक माहौल नहीं बन पाया। उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास निगम ने यहां औद्योगिक आस्थान स्थापित करने के बाद चुप्पी साध ली। जिला उद्योग केंद्र से भी उद्योग को बढ़ावा देने की कोई नीति नहीं तैयार की गई। शहर सीमा से नजदीक भूरागढ़ स्थित औद्योगिक क्षेत्र वीरान पड़ा है।
दो दशक पहले जिला मुख्यालय से सटे भूरागढ़ गांव के पास उत्तर प्रदेश औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआईडीसी) ने 99 एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहीत कर 150 छोटे-बडे़ भूखंड विकसित किए थे। इनमें 120 भूखंड आवंटित हो चुके हैं। आवंटन के बाद यूपीएसआईडीसी ने यहां सड़कों के रखरखाव और बिजली-पानी की कोई व्यवस्था नहीं की। नालियां और सड़कें ध्वस्त हो चुकी हैं। नतीजे में दो दशक बीतने के बाद भी यहां कोई उद्योग फल-फूल नहीं पाया।
उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश उपाध्यक्ष संतोष कुमार गुप्ता जिले के औद्योगिक विकास में पिछड़ेपन के पीछे यूपीएसआईडीसी को प्रमुख रूप से जिम्मेदार ठहराते हैं। उनका कहना है कि यूपीएसआईडीसी ने उद्योगों को बढ़ावा देने के बजाए खुद अपना उद्योग चला रखा है। उद्योग लगाने के इच्छुक आवंटियों द्वारा दो-चार किश्तें जमा करने के बाद कोई न कोई बहाना बनाकर आवंटन निरस्त कर दिया जाता है। इसके बाद दूसरे व्यक्ति को भूखंड आवंटित कर किश्तें वसूलना शुरू कर देते हैं। उन्होंने प्रदेश सरकार द्वारा प्र्रस्तावित मसौदे की सराहना करते हुए कहा कि इस पर अमल किया गया तो उद्योग पनप सकेंगे।

10 साल तक मिले सब्सिडी
बांदा। औद्योगिक क्षेत्र में भूखंड आवंटित करा चुके विनोद ओमर का कहना है कि सरकार बुंदेलखंड में उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए कम से कम 10 साल तक बिजली, व्यापार कर, इनकम टैक्स आदि में सब्सिडी दे तभी बात बन सकती है। कच्चे माल की उपलब्धता, माल की ढुलाई को अच्छी सड़कें, नियमित बिजली आपूर्ति के साथ औद्योगिक माहौल तैयार किया जाना जरूरी है। मौजूदा समय में बडे़ उद्योगों की प्रतिस्पर्धा में बाहरी उद्योगपतियों को भी यहां उद्योग लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।


संसाधनाें का अभाव उद्योग स्थापना में रोड़ा
अमर उजाला ब्यूरो
महोबा। बुंदेलखंड में बिजली, पानी और कच्चे माल की समस्या को लेकर उद्यमी यहां पर उद्योग लगाने से कतराते हैं। इक्का-दुक्का उद्यमियाें द्वारा उद्योग लगाने के बावजूद वह पनप नहीं पाए। कारण, सरकार से न तो कोई लोन में छूट और न ही सब्सिडी न मिली। नतीजतन उद्योग धंधे बंद हो गए।
जिले में महज एक बजरिया में इंडस्ट्रियल इस्टेट है। जहां पर जूता और बर्तन बनाने में तमाम श्रमिक लगे हुए हैं। लेकिन यह उद्योग भी शासन द्वारा किसी भी तरह की सहायता न मिलने से घिसट रहे हैं। इन उद्योगाें को आगे बढ़ाने के लिए सरकार ने उद्यमियाें की किसी भी तरह की कोई मदद नहीं की। इंसेट
टूटी सड़कों से पत्थर उद्योग प्रभावित
महोबा। पत्थर उद्योग से जुड़े ब्रजेंद्र सिंह कहते हैं कि सड़कें ऊबड़ खाबड़ होने से डेढ़ हजार ट्रकाें के स्थान पर आधे ट्रकाें ने आना बंद कर दिया है। जिससे ग्रिट की खपत नहीं हो पा रही है।
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