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पांच अरब पौने दो करोड़ की 163 योजनाएं लटकीं

Jalaun

Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
उरई (जालौन)। विकास की सरकारी योजनाओं का पुरसाहाल नहीं है। 25 लाख रुपए से अधिक की निर्माणाधीन परियोजनाएं समय से पूरी नहीं हो सकीं। इससे उनकी निर्माण लागत लगातार बढ़ रही है। अधिकारी पुनरीक्षित बजट की आस लगाए है। इसके अलावा भी जिले में पांच अरब पौने दो करोड़ रुपए की लागत की 163 परियोजनाएं अधूरी पड़ी हैं।
जिले में 163 परियोजनाएं डेढ़ वर्ष से अधूरी है। काम समय पर न होने से निर्माण कार्यों की लागत हर रोज बढ़ रही है। लोक निर्माण विभाग, राजकीय निर्माण निगम, सीएंडडीएस, यूपी प्रोजेक्ट कारपोरेशन, समाज कल्याण निर्माण, समाज कल्याण निर्माण निगम, श्रम संविदा, सहकारी संघ की परियोजनाओं को पूरा करने के लिए तीन सौ करोड़ 67 लाख रुपए की आवश्यकता है। परियोजनाओं की बढ़ रही निर्माण लागत का उदाहरण है कि जुही खां घाट पुल का निर्माण 23 करोड़ 78 लाख में स्वीकृत हुआ था लेकिन पुल का काम समय से नहीं हो पाया। इससे इसकी लागत 27 करोड़ 55 लाख रुपए हो गई। दुग्ध संघ की एक परियोजना का निर्माण गुजरात की एक संस्था कर रही है जिसकी लागत 72 लाख है लेकिन कार्य अब तक नहीं हो पाया। राज्य सेतु निगम के तीन पुल अभी भी अधूरे हैं। जलनिगम शाखा की 13 परियोजनाएं अधूरी हैं। जलनिगम की 6, पैक्सफेड की आठ व यूपी श्रम एवं निर्माण सहकारी संघ की चार परियोजनाएं अधूरी हैं।
विकास योजना से तो महेबा का विद्युत उपकेंद्र बीते पांच सालों से अभी तक अधूरा है। माधौगढ़ का पालीटेक्निक, बेसिक शिक्षा का कस्तूरबा गांधी विद्यालय व नवीन मल्टीस्टोरी विद्यालय भवन उरई, कोंच, कालपी के अभी भी अधूरे पडे़ हैं। यूपीपीसीएल जैसी कार्यदायी संस्था का एक करोड़ रुपए की लागत का मानसिक अवसाद ग्रस्त विद्यालय, कांशीराम शहरी आवास योजना कोंच व कालपी के काम अभी भी अधूरे हैं।
कार्यदायी संस्था यूपीपीसीएल, पैक्स फेड की कार्यप्रणाली तो हमेशा से ही विवादों में घिरी रही है। यूपीपीसीएल, समाज कल्याण निर्माण निगम ने तो नलकूपों की स्थापना में अपने मनमाने इस्टीमेटों को शासन की बिना स्वीकृत के भुगतान कराए। उदाहरण है कि छह लाख 50 हजार का नलकूप 9 लाख 40 हजार से लेकर 16 लाख रुपए तक इन संस्थाओं ने लगाए। पैक्सफेड संस्थाओं ने तो सात पशुरौधालयों का प्रति इकाई इस्टीमेट पहले साढे़ चार लाख का बनाया। अब उसी की निर्माण लागत खुद नौ लाख रुपए कर डाली। इन कार्यदायी संस्थाओं की मनमानी पर प्रशासन भी अंकुश नहीं लगा पा रहा है।

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