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मनभावन सावन में नहीं पड़ते अमुवा कीडाल पर झूले

Jalaun

Updated Thu, 12 Jul 2012 12:00 PM IST
मुहम्मदाबाद (जालौन)। समय और आधुनिकता के प्रवाह में ग्रामीण परिदृश्य भी तेजी से बदलता जा रहा है। इसी के साथ बदल रही हैं पुरानी परंपराएं, मान्यताएं और बहुरंगी समृद्ध लोक जीवन । यही वजह है गांवोें में सावन माह अब अतीत की परछाईं नजर आता है। गांवों में अब न तो अमुवा की डाल पर झूले पड़ते हैं और न सावन के मधुर गीत गाती युवतियां।
सावन मास चल रहा है मगर अभी भी उमस व तेज धूप से लोग परेशान नजर आ रहे हैं। जबकि चार दशक पहले ऐसा नहीं था सावन के महीने में ठंडी रिमझिम फुहारों से लोगों का तन-मन भीग जाता था। अब पहले का माहौल विलुप्त होता जा रहा है। अब न तो समय से बरसात हो रही है और न समय से सर्दी और गर्मी पड़ रही है। पहले सावन के पहले सप्ताह में गांवों के बागों में पेड़ों की डालों पर झूले पड़ जाते थे। इनमें गांव के बच्च्े, युवक, युवतियां महीने भर झूला झूलते थे। ग्रामीण युवतियां और महिलाएं सावन गीत और मल्हार देर रात तक झूले के पास बैठकर गीत गाती थी। एक दूसरे से ऊंचा झूला झूलने की होड़ लगती थी। पहले गांव के सभी जाति व धर्म के लोग एक साथ बैठकर सावन के झूलों का आनंद उठाते थे। मगर वक्त बदलने के साथ
गांवों के यह पुराने दृश्य अब दुर्लभ होते जा रहे हैं। अब न कहीं सावन के गीत सुनाई दे रहे है और न कोयल की कूक सुनाई देती है।
कई वर्ष पहले साठ-साठ फुट गहरे कुओं से गांवों में पानी भरा जाता था। हर परिवार में पानी भरने के लिए रस्सियां होती थी। ये रस्सियां सावन के झूले झूलने के काम आ जाती थी। अब तो कुएं भी समाप्त होते जा रहे हैं। इसलिए अब रस्सियां भी देखने को नहीं मिल रही हैं। अब मकान व बस्तियां बसाने के चक्कर में लोगों ने हरे भरे पेड़ों को भी काट डाला है। इन्हीं कारणों से सावन का त्योहार फीका नजर आ रहा है। गांवों के बुर्जुग लल्लू महतो, साबिर हुसैन, साबिरा और सावित्री देवी बताती हैं हमने ऐसा समय भी देखा है जब सभी जाति व धर्म के बच्चे व महिलाओं और पुरुष गांव के बागों में एक साथ बैठकर झूला झूलते थे और साथ खाते-गाते थे। लेकिन अब आपसी प्रेम भावना खत्म होने के साथ मनभावन सावन की पुरानी परंपराएं भी विलुप्त होती जा रही हैं। अब तो यही तमन्ना है काश पुराने दिन फिर लौट आएं।
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