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नकेलपुरा गांव को प्रदेश में मिला मॉडल का दर्जा

Jalaun

Updated Sat, 07 Jul 2012 12:00 PM IST
उरई (जालौन)। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से ग्राम पंचायत नकेलपुरा की महिलाओं ने एक मिसाल प्रस्तुत की है। उन्होंने न केवल अपनी तकदीर संवारी, गांव की अन्य महिलाओं को भी तरक्की की राह दिखाई है। इसके लिए प्रदेश में इस गांव को माडल का दर्जा मिला है।
जालौन के जिला मुख्यालय से 65 किलोमीटर दूरी पर स्थित कुठौंद विकास खंड के ग्राम पंचायत नकेलपुरा की कुल जनसंख्या लगभग 1200 है। यदि परिवार की दृष्टि से देखा जाए तो यहां कुल 198 परिवार निवास करते हैं जिसमें से 85 बीपीएल परिवार हैं। इनमें 58 परिवार दलित हैं। वैसे तो गांव के ज्यादातर लोगों पर थोड़ी बहुत जमीन है। आय का दूसरा कोई स्त्रोत न होने से ये लोग खेती पर ही निर्भर है। गांव के अधिकतर दलित व पिछड़ी जाति के परिवार भूमिहीन हैं। हालांकि कुछ परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें भूमिहीन तो नहीं कह सकते लेकिन इनके पास इतनी कम या नाम मात्र की जमीन है कि वह उसमें सालभर का अनाज भी नहीं उगता। ऐसे में ये परिवार अपनी आजीविका चलाने के लिए पूरी तरह मजदूरी पर ही निर्भर थे। काम न मिलने पर यह लोग दूसरे शहरों में पलायन कर जाते थे।
इसी दौरान 2006-07 में परमार्थ समाज सेवी संस्थान ने काम करना शुुरू किया और गांव की स्थिति जानने के बाद सर्वप्रथम यहां छह स्वयं सहायता समूहों का निर्माण कर खाता व समूह संचालन करवाए। धीरे धीरे समूहों में जोड़ने के बाद इन लोगों को स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना से जोड़कर बैंक से चार से पांच लाख रुपए तक ऋण उपलब्ध कराया। जिससे इन लोगों ने व्यवसाय के रूप में पशुपालन शुरू किया। भैंसों का दूध दूध बेचने से आमदनी बढ़ी तो इन लोगों ने अन्य छोटे मोटे व्यवसाय की शुुरुआत की जो आज सफल साबित हो रहे हैं। परिवार के जीवन स्तर में बदलाव आया। शुुरुआत में उन्हें तमाम तरह के विरोध व कठिनाइयों का सामना करना पड़ा लेकिन संस्थान केे कार्यकर्ताओं ने इस गांव को उस मुकाम तक पहुंचाया जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।
जो महिलाएं पुुरुषों से आंखें मिलाकर बात करने में हिचकिचाती थीं, अब बैंक से लेनदेन से लेकर अपना व्यवसाय संभाल रही हैं। नकेलपुरा गांव में संचालित छह स्वयं सहायता समूह में दो चार पुरुषों को छोड़कर बाकी सभी महिलाएं ही सदस्य हैं। अध्यक्ष व कोषाध्यक्ष जैसे जिम्मेदार पद पर महिलाएं ही हैं। प्रत्येक माह इन समूहों की बैठक होती है। जिसमें मासिक जमा व समूह के सदस्यों को जरूरत के हिसाब से ऋण देने व दिए गए ऋण की किस्त जमा करने पर चर्चा होती है। समूह मेें 11 से लेकर 13 सदस्य हैं। जय भोले स्वयं सहायता समूह की कोषाध्यक्ष मुन्नी देवी, जय मां काली स्वयं सहायता समूह की अध्यक्ष मीरा देवी व सिद्ध बाबा समूह की लालकुंवर देवी का कहना है कि हम लोगों ने खुद मेहनत व मजदूरी कर मासिक बचत कर समूह को बंद होने नहीं दिया। प्रत्येक समूह की प्रत्येक महिला एक या दो भैंस की मालिक है। पूरे गांव में स्वयं सहायता समूह की एक सैकड़ा से अधिक भैंसे हैं। वर्तमान में गांव में ढाई से तीन कुंतल तक दूध रोज होता है। यहां कोई सुविधा न होने से हम लोगों को दूध मनमाने दामों में खरीदा जाता है। यदि यहां एक डेरी की व्यवस्था हो जाए तो आमदनी और बढ़ जाए। जय भोले समूह की विद्यावती का कहना है कि भैंसों का दूध बेचकर हम लोगों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। खास बात यह है कि महिलाओं के इस व्यवसाय से पुरुषों का कोई लेना देना नहीं है। कई महिलाएं तो ऐसी हैं जो भैसों के अलावा भी समूह के माध्यम से लोन लेकर अन्य व्यवसाय कर रहीं हैं।
मीरा देवी किे पास मात्रा एक बीघा जमीन है। छह लोगों का परिवार है। समूह के माध्यम से ऋण लेकर इनके पास दो भैंसों के अलावा टेंट व्यवसाय भी है। इंद्रकली ने भी समूह से पैसा निकालकर पचास हजार का बैंड खरीदा। जिसे शादियों में बजाकर धीरे धीरे किश्त भी जमा कर रहीं हैं। इंद्रकली का बरसा में मकान गिर गया था जिस कारण इनका परिवार पंचायत घर में रह रहा है। अब आर्थिक स्थिति थोड़ी अच्छी होने से वह अपना पक्का मकान बनाने की सोच रही हैं। गांव पूरी तरह खुशहाल हो गया है। वर्तमान में स्वयं सहायता समूहों की बचत तीन लाख रुपए के आसपास है। दुर्गे समूह की सदस्य जयदेवी काली समिति की रामरती ने बताया कि हमारी एक एक भैंस एक वर्ष पहले मर गई थी। कई बार प्रयास करने पर आज तक बीमा लाभ नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि गांव में तैनात सचिव अश्विनी गुबरेले हम लोगों का सहयोग नहीं करते।
जिलाधिकारी मनीषा त्रिघाटिया ने कहा कि नकेलपुरा कि महिलाओं ने जिस श्रम व लगन से काम करके गांव को प्रदेश में एक माडल बनाया है। इसे जिले के अन्य गांवों भी ले जाया जाएगा। इसके लिए गांवों के महिला समूहों की प्रगति की डाक्यूमेंट्री फिल्म बनवाकर अन्य गांवों के लोगों को दिखाई जाएगी जिससे वे प्रेरणा लेंगे।
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