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माइनर की सफाई न होने से किसान परेशान

Jalaun

Updated Mon, 22 Oct 2012 12:00 PM IST
कोंच (जालौन)। भेंड़ माइनर की खुदाई और सफाई नहीं होने से किसान परेशान हैं। उनके खेतों तक पानी नहीं पहुंच पाने से किसान पलेवा नहीं कर पा रहे हैं। किसानों ने सूबे के सिंचाई मंत्री और जिलाधिकारी को चिट्ठियां लिख कर समस्या के निदान की गुहार लगाई है।
10 जुलाई 2012 को कोंच मंडी में भारतीय किसान यूनियन की मासिक पंचायत में किसानों ने मांग उठाई थी कि जालौन रजवहा से निकली छानी भेंड़ माइनर में सफाई नहीं होने से हैड से एक किमी तक भी पानी नहीं पहुंच पाता है। किसानों ने सिंचाई विभाग के अधिकारियों से माइनर की खुदाई और सफाई की मांग की थी, तीन माह से भी अधिक का समय गुजर जाने के बाद भी इस पर ध्यान नहीं दिया। ग्राम छानी के अंशुल राठौर, कन्हैयालाल निरंजन, कुमार शुभम पटेल, प्रभुदयाल वर्मा, मनीष निरंजन, श्याम किशोर पटेल, योगेश कुमार निरंजन, गयाप्रसाद वर्मा आदि किसानों ने प्रदेश के सिंचाई मंत्री और जिलाधिकारी जालौन को पत्र लिख कर कहा है कि यह कोई नई समस्या नहीं है बल्कि पिछले कई वर्षों से छानी-भेंड़ माइनर से जुड़े टेल के किसानों को पानी नहीं मिल पा रहा है। इसका कारण माइनर की कम चौड़ाई व सफाई खुदाई का न होना है। पानी के अभाव में अक्सर खेत बिना बुआई के ही पड़े रहते हैं।
इनसेट
किसान खेत में प्रति बीघा दो बोरी जिप्सम जरुर डालें-राजीव सिंह
उरई(जालौन)।किसानों को चाहिए कि वह यदि अपने खेतों का पलेवा कर रहे हैं तो पलेवा सिंचाई के पहले खेत में प्रति बीघे एक से दो बोरी जिप्सम जरुर डाले ताकि खेत में मौजूद रसायनिक तत्वों का खार खत्म हो जाए। जिप्सम के प्रयोग से दलहनी फसलों का दाना मजबूत व चमकीला भी होगा। यह कहना है कृ़षि वैज्ञानिक डॉ. राजीव सिंह का। वह आज अमर उजाला से बात कर रहे थे।
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सिंह ने कहा कि किसानों को सबसे कम लागत की खेती का गुर सीख लेना चाहिए। यह तभी संभव है जब किसान अपने खेत की मिट्टी का मृदा परीक्षण कराए। मृदा परीक्षण से किसानों को यह पता चल जाएगा कि खेत में जिंस पोराश फास्फेट में किन तत्वों का कमी है। जिले के किसानों की आदत में अभी जैविक खेती की आदत कम है। खेतों में रसायनिक तत्वों की इतनी अधिक मात्रा हो गई कि उत्पादन कम होता जा रहा। खेतों में नमक की मात्रा अधिक है। उसकी काट के लिए किसान पलेवा सिंचाई के पहले प्रति बीघा जिप्सम खाद की प्रति बीघा एक बोरी अवश्य डाले। जिप्सम के प्रयोग से खेत में बोई गई फसल का पौधा दाना मजबूत व चमकदार होगा और उत्पादन में दस से 15 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। उन्होंने कहा कि जब दलहनी फसलें उग आए और उनमें यूरिया का छिड़काव करना हो तो यूरिया के घोल का छिड़काव और घोल छिड़कने से पौधे को सीधे नाइट्रोजन मिलेगा। इससे पौघ्धे की बढ़वार व दाना और अधिक मजबूत होगा। किसान छोटी छोटी विधियां अपना कर अपनी खेती की लागत कम कर सकता है। वह कहते हैं कि जो लोग गुटखा नहीं खाते। अब तो उन्हें भी कैंसर हो रहा। उम्र के पहले बाल पक रहे हैं। यह सब कमाल रसायनिक खादों से उत्पादित खाद्यान्न का सेवन करने का कमाल है। जो लोग जैविक खेती कर रहे हैं उनके माल की आज भी मार्केट में कीमत अधिक है। जैविक खादों से उत्पादित गेहूं, दाल, सब्जियों केे उत्पादन पर तो सरकार किसानों को बडे़ पैमाने पर अनुदान देने की योजना शुरु कर रही है। किसानों को चाहिए कि वह नई तकनीक अपनाकर उत्पादन जरुर बढ़ाए।
बाक्स-
बीज शोधन में बरते सावधानी
उरई। रसायनिक विधि में रसायनों की निर्धारित मात्रा ही प्रयोग करें या जैविक या फिर रसायनिक विधियों में किसी एक को अपनाए। खास बात ध्यान यह रखे कि बीज शोधन में आज जो कल्चर मिला रहे हैं उनकी निर्माण तिथि व एक्सपायर तिथि जरुर देख ले। क्योंकि बायों व जैविक एजेंट जीवाणु होते हैं जो फसलों को पोषक बनाते हैं। उपचारित बीजों में तत्काल रसायनिक खाद कतई न मिलाए। शोधित बीज को धूप सूरज की गर्मी से दूर रखे।
बाक्स
कैसे करें बीज शोधन
उरई। मटर, मसूर, चना हो या गेेहूं बोने के पहले किसान बीज शोधन जरुर करें। सबसे पहले बीज को जूट के बोरे में डाले। उसमें उबले हुए ठंडे पानी में गुड़ का घोल बनाकर उसे बीज पर छिड़के फिर उसे अच्छी तरह मिला दें। इसके बाद बीज पर ट्राइकोडर्मा स्पोर, राइजोवियम, फास्फेटिका जैसे कल्चर मिला दे। यह कल्चर गुड़ के शीरे में सने बीज के चारों तरफ चिपक जाएगा। रात भर बंद कमरे में पूरा बीज डला रहने दे। इसके बाद जब बोये तो खाद मिलाकर बो दे। यह प्रक्रिया करने से पौध को लाभदायक पर्याप्त जीवाणु मिल जाएंगे। फसल अच्छी होेगी।
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